।। जय भगवान श्री गणेश जी ।।
हिमालय की निस्तब्धता के बीच एक ऋषि के मन में ऐसा तूफ़ान उठ रहा था, जिसे बाहर से देखने वाला शायद कभी समझ ही न पाता। आश्रम के बाहर हवा वैसी ही बह रही थी जैसे सदियों से बहती आई थी। पेड़ों की पत्तियाँ वैसे ही सरसराती थीं, नदी वैसे ही अपने किनारों से बात करती थी, और आकाश वैसा ही विशाल था। पर ऋषि व्यास के भीतर एक ऐसा युग जाग रहा था, जो केवल बीत चुका इतिहास नहीं था- वह मनुष्य के भीतर का पूरा संघर्ष था। उनकी आँखों में राजमहलों की चमक भी थी और कुरुक्षेत्र की धूल भी। उनके कानों में शंखनाद भी गूँजता था और एक माँ की दबाई हुई सिसकी भी। उन्हें याद थे वे वचन जो निभाए गए, और वे भी जो लोभ और अहंकार के नीचे कुचल दिए गए। उन्हें दिखाई देती थी सत्ता की चकाचौंध, लेकिन उससे भी अधिक स्पष्ट दिखाई देता था उसका विनाश।
व्यास जानते थे कि जो कुछ उनके भीतर है, वह केवल कथा नहीं है। यह मनुष्य का दर्पण है। इसमें राजा हैं, पर केवल राजा नहीं; इसमें योद्धा हैं, पर केवल युद्ध नहीं; इसमें भाई हैं, पर केवल रक्त का संबंध नहीं; इसमें प्रतिशोध है, लेकिन उसके भीतर करुणा का कंपन भी है। यह ऐसी गाथा थी जिसे केवल सुनकर भूल जाना अन्याय होता। इसे पीढ़ियों तक पहुँचना था, ताकि आने वाले लोग समझ सकें कि धर्म का मार्ग सीधा नहीं होता, कि सच्चाई अक्सर सुविधा के विरुद्ध खड़ी होती है, कि शक्ति बिना विवेक के विनाश बन जाती है।
कई रातों तक व्यास सो नहीं सके। कभी वे आकाश की ओर देखते, कभी अग्नि की लौ में खो जाते। उनके शिष्य पूछते, “गुरुदेव, आप इतने मौन क्यों हैं?”
व्यास बस हल्की मुस्कान देकर रह जाते। क्या कहते? कि उनके भीतर महाभारत धड़क रहा है? कि हर श्लोक के साथ जैसे समय स्वयं जन्म लेना चाहता है? कि उन्हें भय है- यदि यह सब केवल स्मृति में रह गया, तो भविष्य अपने सबसे बड़े दर्पण से वंचित हो जाएगा?
एक रात उन्होंने गहरी साँस ली और स्वयं से कहा, “अब इसे शब्दों में उतरना ही होगा। यह कथा मेरी नहीं रह सकती। इसे युगों की धरोहर बनना होगा।”
पर अगले ही क्षण एक और प्रश्न उनके सामने खड़ा हो गया- इतनी विराट गाथा को लिखे कौन?
यह काम किसी साधारण लिपिक का नहीं था। यहाँ केवल हाथों की फुर्ती नहीं, बुद्धि की गहराई चाहिए थी। जो श्लोक सुनते ही उसके भीतर उतर सके। जो केवल अक्षर न लिखे, अर्थ को पकड़े। जो थके नहीं, डगमगाए नहीं, और इतना विशाल प्रवाह बिना तोड़े शब्दों में बाँध सके। व्यास ने आँखें बंद कीं। ध्यान में उतरते-उतरते एक नाम उनके भीतर उजाले की तरह चमका—गणेश।
और उसी नाम के साथ जैसे नियति ने भी अपनी अगली चाल चलने की तैयारी कर ली।
प्रातःकाल का समय था। आकाश में हल्का सुनहरापन उतर रहा था। व्यास ने अपने आसन पर बैठकर मन को स्थिर किया और गणेश का स्मरण किया। कुछ ही क्षणों बाद वातावरण में एक अलौकिक शांति फैल गई। जैसे हवा भी संयत होकर खड़ी हो गई हो। फिर वह दिव्य उपस्थिति सामने थी- शांत, गंभीर, तेजस्वी। बालसुलभ सरलता और अनंत प्रज्ञा का अद्भुत संगम।
व्यास उठे, हाथ जोड़कर बोले, “विनायक, मैं आपके सामने एक विनती लेकर आया हूँ।”
गणेश ने सहज स्वर में कहा, “ऋषिवर, आपके मन में जो बात है, वह साधारण नहीं लगती। कहिए।”
।। श्री गणेशाय नमः ।।













