मुनि अगस्त्यजी के शिष्य  सुतीक्ष्ण

।। जय श्रीराम ।।

मुनि अगस्ति कर सिष्य सुजाना।
नाम सुतीछन रति भगवाना।।

मन क्रम बचन राम पद सेवक।
सपनेहुँ आन भरोस न देवक।।

भावार्थ-
मुनि अगस्त्यजी के एक सुतीक्ष्ण नामक सुजान (ज्ञानी) शिष्य थे, उनकी भगवान में प्रीति थी। वे मन, वचन और कर्म से श्री रामजी के चरणों के सेवक थे। उन्हें स्वप्न में भी किसी दूसरे देवता का भरोसा नहीं था।

शरभंग मुनि के आश्रम पर आए हुए समस्त ऋषि समुदाय से मिलकर जब राम, लक्ष्मण एवं सीता के साथ सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम पर पहुँचे, तब मुनि ने उनका अभिनन्दन किया और कहा कि वे उन्हीं की प्रतीक्षा कर रहे थे, इसीलिए शरीर को त्यागकर देवलोक में नहीं गए थे।

सुतीक्ष्ण ने तप से प्राप्त हुए लोकों को राम को देना चाहा परन्तु राम ने उन्हें ही लोक प्रदान करने का आश्वासन देकर अपने निवास हेतु स्थान माँगा। सुतीक्ष्ण मुनि ने अपने आश्रम को ही निवास हेतु श्रेष्ठ बतलाते हुए राम से कहा कि यहाँ ऋषियों का समुदाय सदा आता – जाता रहता है, फल-मूल सर्वदा सुलभ होते हैं, मृगों के झुण्ड आते हैं और मन को लुभाकर लौट जाते हैं तथा मृगों के उपद्रव से सिवा यहाँ कोई दोष नहीं है।

राम ने लक्ष्मण और सीता के साथ रात्रि में वहीं निवास किया परन्तु प्रातःकाल होने पर दण्डकारण्य में निवास करने वाले ऋषियों के आश्रम – मण्डलों का दर्शन करने के लिए सुतीक्ष्ण मुनि से आज्ञा माँगी। सुतीक्ष्ण ने आश्रम – मण्डलों का दर्शन करके पुनः लौटने के लिए राम से प्रार्थना की। तदनुसार राम सब ओर घूम – फिरकर सुतीक्ष्ण के आश्रम पर लौट आए और दस वर्ष तक वहीं रहे।

कथा प्रतीकात्मक है। अतः सभी प्रतीकों को समझ लेना अति उपयोगी होगा।

सुतीक्ष्ण मुनि-
सुतीक्ष्ण शब्द सुति और ईक्षण नाम दो शब्दों के मिलने से बना है। सुति (सु – क्तिन्) का अर्थ है- सोमरस को निकालना, ईक्षण का अर्थ है- सोचना, विचारना, समझना या देखना आदि। सोमरस एक वैदिक शब्द है जिसका अभिप्राय है- अमृत अर्थात् सुख- शान्ति- प्रेम तथा आनन्द से भरपूर आत्मा। अतः सोमरस को निकालने का अर्थ हुआ- सुख, शान्ति, प्रेम तथा आनन्द से भरपूर आत्मा को विस्मृति से स्मृति में लाना अर्थात् यह समझना कि मैं शरीर नहीं, अपितु शरीर को चलाने वाला, सुख- शान्ति- प्रेम तथा आनन्द से भरपूर चैतन्य शक्ति आत्मा हूँ।

मुनि शब्द मन को इंगित करता है, अतः जो मन सुख- शान्ति- प्रेम तथा आनन्द से भरपूर आत्मा के विचार में, चिन्तन में, स्मरण में प्रवृत्त हो गया है- वह सुतीक्ष्ण मुनि है। एक शब्द में यदि कहना चाहें तो आत्मकेन्द्रित मन को अथवा ध्यानस्थ मन को सुतीक्ष्ण मुनि कहा जा सकता है।

आत्मकेन्द्रित मन अथवा ध्यानस्थ मन कहने से अधिकांशतः यह धारणा उभरती है कि ध्यानस्थ मन वह है जो समस्त कर्त्तव्य – कर्मों को छोडकर आँख बन्द करके बैठ गया है। परन्तु यह धारणा सही नहीं है। आत्मकेन्द्रित अथवा ध्यानस्थ मन वह है जो सुख- शान्ति- प्रेम तथा आनन्द स्वरूप आत्मा का सतत् स्मरण रखता हुआ समस्त कर्त्तव्य – कर्मों का यथोचित निर्वाह करता है।

इस आत्मकेन्द्रित अथवा ध्यानस्थ मन का लक्ष्य है- सतत् आत्मचिन्तन करते हुए मनुष्य को उसकी इस सही पहचान में स्थित कराना कि वह शरीर नहीं, अपितु शरीर को चलाने वाला, शरीर का मालिक, सुख – शान्ति – प्रेम तथा आनन्द से भरपूर, अजर- अमर – अविनाशी- चैतन्यशक्ति आत्मा है। इस सही पहचान के आगमन को ही कथा में सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम में राम का आगमन कहकर इंगित किया गया है।

सुतीक्ष्ण मुनि को तप से प्राप्त हुए लोक- आत्मकेन्द्रित अथवा ध्यानस्थ मन श्रेष्ठ सामर्थ्य से युक्त होकर दया दृष्टि, सेवा दृष्टि, परोपकार दृष्टि, स्नेह दृष्टि तथा क्षमा दृष्टि जैसी जिन अनेक दृष्टियों से युक्त हो जाता है, उन्हें ही कथा में सुतीक्ष्ण मुनि द्वारा तप से प्राप्त हुए लोक कहा गया है। आत्म दृष्टि के विकसित होने पर ुपर्युक्त वर्णित दृष्टियों का आत्मदृष्टि में अन्तर्भाव हो जाता है, इसलिए कथा में कहा गया है कि सुतीक्ष्ण मुनि ने तप से प्राप्त हुए लोकों को राम को देना चाहा।

सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम में ऋषियों का आना-जाना-
ऋषि शब्द श्रेष्ठ विचार का वाचक है। अतः सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम में ऋषियों का आना- जाना कहकर कहकर यह संकेत किया गया है कि आत्मकेन्द्रित अथवा ध्यानस्थ मन की स्थिति में ही मन के भीतर श्रेष्ठ विचारों का आना – जाना बना रहता है। शरीर अथवा संसार की ओर लगा हुआ मन इस योग्य नहीं होता कि वह अपने भीतर श्रेष्ठ विचारों को धारण कर सके।

सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम में फल – मूल का सर्वदा सुलभ होना-
यहाँ फल शब्द कार्य और मूल शब्द कारण का वाचक है। अतः सुतीक्ष्ण के आश्रम में फल – मूल की सुलभता कहकर यह संकेत किया गया है कि आत्मकेन्द्रित अथवा ध्यानस्थ मन ही कार्य और कारण का सतत् चिन्तन करता है। आत्मा (मनुष्य) की यात्रा अनवरत है। वह एक शरीर छोडता है तथा दूसरा ग्रहण करता है।

शरीर छोडने और ग्रहण करने की लम्बी यात्रा में वह जो भी मानसिक, वाचिक अथवा कायिक कर्म करता है- उनकी छापें उसके चित्त(अवचेतन मन) में इकट्ठी होती हैं। फिर उन छापों के अनुसार ही जीवन में विभिन्न परिस्थितियाँ उपस्थित होती हैं। जीवन में उपस्थित हुई परिस्थितियाँ वास्तव में पूर्व में किए गए अपने ही कर्मों का कार्य (परिणाम /फल) है।

उपस्थित परिस्थितियों के आधार पर जब मनुष्य पुनः कर्म करता है, तब उसका वह कर्म ही भविष्य में आने वाली परिस्थितियों का कारणरूप हो जाता है। इस आधार पर आत्म- केन्द्रित अथवा ध्यानस्थ मन कार्य- कारण का सम्यक् चिन्तन करता हुआ व्यर्थ, अनुपयोगी, नकारात्मक विचारों के निर्माण से बचा रहता है। शरीर अथवा संसारकेन्द्रित मन में इस कार्य- कारण की चिन्तना नहीं होती।

सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम में मृगों का आना-जाना-
मृग शब्द अन्वेषण अर्थ वाली मृग् धातु से बना है। अतः पौराणिक साहित्य में आया हुआ मृग शब्द किसी पशु- विशेष का वाचक न होकर अन्वेषण अथवा खोज के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम में मृगों का आना – जाना कहकर यह संकेत किया गया है कि आत्मकेन्द्रित अथवा ध्यानस्थ मन ही अन्वेषण शक्ति से युक्त होता है, अतः उसका सारा मनन- चिन्तन ही अन्वेषण- परक होता है। वह प्रत्येक विषय की खोजबीन करके उसके मर्म को समझने का यथासम्भव प्रयास करता है। शरीर अथवा संसारकेन्द्रित मन में यह अन्वेषण क्षमता नहीं होती।

सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम में मृगों का उपद्रव-
मृगों का उपद्रव कहकर यह संकेत किया गया है कि आत्मकेन्द्रित अथवा ध्यानस्थ मन यद्यपि अन्वेषण क्षमता से युक्त होता है और यथासम्भव खोजबीन करके विषय के मर्म को समझ लेता है। परन्तु अनेक बार बहुत खोजबीन के बाद भी वह कठिन विषयों का मर्म नहीं समझ पाता। अतः समाधान प्राप्त होने तक मन के भीतर खोज सम्बन्धी उठापटक चलती ही रहती है, जो मन की स्थिरता में व्यवदान स्वरूप ही है।

राम का ऋषियों के आश्रम- मण्डलों में घूमना-
चूंकि ऋषि श्रेष्ठ विचारों के प्रतीक हैं, अतः ऋषियों के आश्रम – मण्डलों में राम के घूमने का अभिप्राय है- अपने सही स्वरूप- आत्मस्वरूप की पहचान हो जाने पर मनुष्य का श्रेष्ठ विचारों के बीच रहकर उन पर सतत् चिन्तन- मनन करना, उनको जीवन में उतारना तथा उनसे यथासम्भव दिशा- निर्देश ग्रहण करना।

दस वर्ष कहकह यहाँ मनुष्य के शरीर में क्रियाशील दस प्राणों- पाँच स्थूल प्राणों तथा पाँच सूक्ष्म प्राणों की ओर संकेत किया गया है। पाँच स्थूल प्राण हैं- प्राण, अपान, व्यान, समान तथा उदान।

और पाँच सूक्ष्म प्राण हैं- नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त तथा धनञ्जय। राम का दस वर्ष तक सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम में रहना यह संकेत करता है कि स्व-स्वरूप की पहचान अर्थात् आत्मज्ञान जब तक सम्पूर्ण प्राणों में आत्मसात् न हो जाए, तब तक मन का आत्मकेन्द्रित अथवा ध्यानस्थ रहना अनिवार्य है अर्थात् मनुष्य अपने ध्यान को, अपने विचार को, अपनी चिन्तना को तब तक आत्मकेन्द्रित बनाए रखे, जब तक आत्म – स्वरूपता (आत्मज्ञान) प्रगाढ होकर प्राणों में आत्मसात् न हो जाए।

अथवा ऐसा भी कह सकते हैं कि ध्यानस्थ मन के भीतर एक न एक दिन आत्मज्ञान का जो आगमन होता है, वह तब तक वहाँ रहता है जब तक प्राणों में आत्मसात् न हो जाए।

कथा का अभिप्राय-
प्रस्तुत कथा के माध्यम से आत्मकेन्द्रित अथवा ध्यानस्थ मन के महत्त्व को अनेक रूपों में दर्शाया गया है।

आत्मकेन्द्रित अथवा ध्यानस्थ मन इस योग्य होता है कि वह श्रेष्ठ विचारों की धारणा करके उन पर सतत् चिन्तन – मनन करता है। सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम में ऋषियों का आना – जाना कहकर इसी तथ्य को इंगित किया गया है।

आत्मकेन्द्रित अथवा ध्यानस्थ मन जीवन में घटित प्रत्येक घटना के कारण और कार्य पर विचार करने की सामर्थ्य से युक्त होता है। वह समझता है कि कि जीवन में घटित प्रत्येक घटना किसी पूर्व कर्म का कार्य(परिणाम) भी होती है और किसी भावी कर्म का कारण भी। सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम में फल – मूल की सदैव सुलभता के रूप में इसी तथ्य को व्यक्त किया गया है।

आत्मकेन्द्रित अथवा ध्यानस्थ मन अन्वेषण परक होता है। वह किसी भी विषय की खोजबीन करके समाधान तक पहुँचने का यथासम्भव प्रयत्न करता है। सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम में मृगों का आना – जाना कहकर इसी तथ्य का संकेत किया गया है।

आत्मकेन्द्रित अथवा ध्यानस्थ मन अन्वेषणपरक होने पर भी अनेक बार समाधान प्राप्त न होने के कारण ऊहापोह में पड जाता है। मृगों के उपद्रव के रूप में इसी बात को संकेतित किया गया है।

आत्मकेन्द्रित अथवा ध्यानस्थ मन एक न एक दिन आत्म-ज्ञान को प्राप्त कर लेता है, जो उसका मूल उद्देश्य ही है। सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम में राम का आगमन कहकर इसी तथ्य को व्यक्त किया गया है।

मन के ध्यानस्थ रहने पर ही आत्मज्ञान सम्पूर्ण प्राणों में आत्मसात् होकर एक – एक श्रेष्ठ विचार की चिन्तना में प्रवृत्त होता है, जिसे कथा में राम का ऋषियों के आश्रम मण्डलों में घूमना और दस वर्ष तक सुतीक्ष्ण के आश्रम में रहना कहा गया है। ।। श्री रामाय नमः ।।

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