श्यामा जू पर प्रभु की कृपा

                     

          क्या किसी पशु को भी प्रभु से प्रीति हो सकती है कि वह प्रभु प्रेम के विरह में  अपने प्राणों को त्याग दे? ऐसी ही एक सत्य घटना है। अयोध्या स्थित कनक भवन की। कनक भवन पुस्तकालय में एक विशेष पुस्तक “कनक महिमा” नाम से है, जिसमें इस मार्मिक सत्य घटना का वर्णन मिलता है।
          कनक भवन में युगल सरकार की दो मूर्तियाँ हैं। एक जो स्थापित रहती हैं और एक वह जो उत्सवों आदि में चलती है अर्थात एक चल मूर्तियाँ और एक अचल मूर्तियाँ है। चल मूर्तियाँ उत्सव आदि मे रथ में बिठाई जाती है।
          उन दिनों एक घोड़ी थी जो रथ में जोती जाती और रथ को लेकर चलती थी। वह कोई संस्कारी पुण्य जीवात्मा थी जो कि संतो को देखकर उनके सम्मान में शीश झुकाती तथा सीताराम कहने पर भाव विभोर होकर उसकी आँखों से अश्रु धारा प्रवाह होने लगती। महात्माओं ने उसका नाम ‘श्यामा जू’ रख दिया। लोग कनक भवन में युगल सरकार के दर्शन करने जाते तो उसके भी दर्शन करते हैं और कहते बड़े भाग्य हैं इसके जो प्रभु सेवा का अवसर प्राप्त है। 
          इसी तरह समय व्यतीत होता गया और श्यामा जू पर बुढ़ापा छाने लगा। कनक भवन के मैनेजर के मन में विचार आया कि श्यामा जू को टीकमगढ़ (झांसी ) वापस भिजवा कर नए अश्व की व्यवस्था कर ली जाए। मैनेजर ने स्टेशन मास्टर से बात की और वहाँ पहुँचकर उन्हें सारी बात बताई। एक दिन निश्चित किया और जो भाड़ा लगना था वह भाड़ा दिया एक डिब्बा आरक्षित हो गया जिसमें बिठाकर श्यामा जू को झांसी तक पहुँचाना था। मैनेजर ने स्टेशन मास्टर को बताया कि झांसी पहुँचकर कुछ लोग श्यामा जू को लेने आ जायेंगे। मैनेजर कनक भवन वापस आए और उन्होंने सब लोगों को यह बात बताई। ना जाने कैसे श्यामा जू को एहसास हो गया कि मुझे अयोध्या से दूर भेजा जा रहा है।
          तीन दिन पूर्व से ही श्यामा जू ने दाना पानी छोड़ दिया, न तो वह पानी पिए न चारा खाए। अवध से दूर होने की बात से दुखी होकर श्यामा जू के नेत्रों से अविरल अश्रु धारा बहने लगी। लोगों ने कनक भवन के मैनेजर को बताया कि श्यामा जू ने दाना पानी छोड़ दिया है, कुछ भी ग्रहण नहीं कर रही है। मैंनेजर समझ गया कि श्यामा जू को यह एहसास हो गया है कि उन्हें अवध से दूर भेजा जा रहा है। मैनेजर ने बोला कि भावनाओं में बहकर तो कर्तव्य की अवहेलना करना उचित नहीं है। 
          धीरे-धीरे श्यामा जू की दशा और भी दयनीय हो गई। वह दिन भी आ गया जब श्यामा जू को लेकर स्टेशन भेजना था। मैनेजर ने सेवकों को आदेश दिया और सेवक श्यामा जू को बाँधा और उसे खींच कर ले चले। श्यामा जू इस हालत में नहीं थी कि वह स्वयं चल सकती। यह दृश्य ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो मछली को जल से दूर किया जा रहा हो। श्यामा जू के नेत्रों से बहती अविरल अश्रु धारा उसके हृदय की करुण पुकार को दर्शा रही थी। वह आगे बढ़ते-बढ़ते बार-बार कनक भवन की ओर मुड़ मुड़कर देखती और आँखों से आँसू बहते। ऐसा लग रहा था कि वह कह रही हो- “एक लालसा यही दयामये, देह अवध में छूटे।”
          सेवक श्यामा जू को ले गए, रोते बिलखते वह गई। डिब्बा पहले से ही तैयार था ले जाकर उसी में डाल दिया और डिब्बे के फाटक बंद कर दिए। उस डिब्बे को रात में आने वाली गाड़ी से जोड़ना था जो झांसी तक जाती है।
          सेवक ने वापस आकर मैनेजर से कहा कि घोड़ी की हालत बहुत ज्यादा खराब है रास्ते में मर जाएगी। अब कनक भवन मैनेजर को भी बहुत दुख हुआ, सोचने लगे कि हम नहीं जानते थे कि बात यहाँ तक पहुँच जाएगी पर अब क्या हो सकता है जैसी प्रभु की लीला। और जब प्रभु के लिए हृदय में सच्चा प्रेम होता है तो वही स्वयं उस तार को तोड़ नहीं पाते। करुणानिधि की ऐसी कृपा हुई कि रेल आई और चली गई और सेवक उसमें डिब्बा जोड़ना ही भूल गए। 
          सवेरे-सवेरे जब स्टेशन मास्टर ने देखा कि अरे यह डिब्बा यहाँ कैसा, कर्मचारियों को बुलाकर खूब डांटा और कहा की दरवाजा खोलो और दरवाजा खुलवाया तो क्या देखते हैं कि श्यामा जू तो मरी पड़ी है। अवध में ही शरीर छूटा अब स्टेशन मास्टर ने मेनेजर को सूचना भिजवाई कि और कहा की क्षमा करें भूल तो हम ही से हुई है श्यामा जू यहाँ पर मृत पड़ी है आप चाहे तो इनका शरीर यहाँ से ले जायें।
          मैनेजर ने अपने साथ कई लोगों को इकट्ठा किया और श्यामा जू को लेने चल दिए। सोचा अच्छा ही हुआ कि अवध में ही शरीर छूटा, कम से कम अयोध्या में ही अंतिम  संस्कार होगा। सेवक श्यामा जू को ले आए और उनके  अंतिम संस्कार की तैयारी होने लगी। जब तक कनक भवन का जमादार भी आ  चुका था जिसका नाम था गुरुद्दीन। जाने गुरूद्दीन के मन में क्या सूझी कि श्यामाजू के कान में मुँह लगाकर बोला कि- 

           श्यामा जू  उठ बैठिए, अब  क्यों पड़ी उदास।
           राम कृपा से आपको, मिलो अवध को वास।।

           जमादार के वचनों का ऐसा प्रभाव हुआ कि श्यामा जू ने अपने दोनों नेत्र खोल दिए और वह जीवित हो गई। श्यामा जू अपने आप को कनक भवन की गलियों में देखकर अति प्रसन्न हुई और कनक भवन की सीढ़ियों पर जाकर अपना सिर रखकर आँसू बहाने लगी। 
          धन्य है प्रभु चरणों की प्रीति। आश्चर्य की बात है कि उसके बाद श्यामा जू पाँच वर्ष और जीवित रही और अंत में अवध में ही अपना शरीर त्यागा।
          धन्य हो श्यामा जू जो पशु होकर भी तुमने प्रभु चरणों से अगाध प्रीति जोड़ी।

              जय जय श्रीकनकबिहारीलालजी

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