प्रेम अलौकिक तत्व है

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प्रेम आत्मा को परमात्मा से जोड़ने वाली कड़ी है। प्रेम अलौकिक तत्व है और विशुद्ध प्रेम केवल परमात्मा के साथ ही हो सकता है। प्रेम की अनुभूति ह्रदय के आहलाद और नेत्रों में भरे प्रेमाश्रु से ही किंचित-मात्र की जा सकती है। प्रेम वाणी का विषय नहीं है अर्थात वाणी इसके वर्णन में पूर्णतया अक्षम है। प्रेम तो ह्रदय में रहता है। प्रेम में स्वार्थ के लिये रंचमात्र भी स्थान नहीं। जहाँ प्रेमास्पद से कुछ भी पाने की कामना है तो निश्चय ही प्रेम के पवित्र आसन को काम कलुषित कर रहा है। प्रेम में देना ही देना है, पाने की कोई कल्पना भी नहीं। प्रेम नित्य-निरन्तर बढ़ता है क्योंकि प्रेमी कभी यह मान ही नहीं सकता कि मुझे पूरा प्रेम है। वह तो अपने प्रेम में निरन्तर कमी ही देखता है। किसी के गुण, रुप अथवा किसी आशा से प्रेम हो और गुण, रुप और आशा का ह्रास होने पर प्रेम घटने लगे तो वह वास्तव में प्रेम है ही नहीं। और…….बिना प्रेम रीझैं नहीं श्री नटवर नन्दकिशोर।

प्रेम सदा बढिबौ करै ज्यों ससिकला सुवेष।
पै पूनों यामें नहीं, तातें कबहुँ न सेष॥

जिस प्रकार गूँगा मिश्री के स्वाद का वर्णन नहीं कर सकता केवल अंतर में अनुभव कर सकता है; किसी से कह नहीं सकता। बढ़ते-बढ़ते एक स्थिति यह आती है कि जब प्रेमी और प्रेमास्पद का भेद भी मिट जाता है।

बाटन में घाटन में बीथिन में बागन में,
बृच्छन में बेलिन में बाटिका में बन में।
दरन में दिवारन में देहरी दरीचन में,
हीरन में हारन में भूषन में तन में॥
कानन में कुंजन में गोपिन में गायन में,
गोकुल में गोधन में दामिनी में घन में।
जहाँ-जहाँ देखौं तहाँ स्याम ही दिखाई देत,
सालिगराम छाइ रहयो नैनन में मन में॥

प्रेमी तो निरन्तर यही चिंतन करता है कि अपने प्रेमास्पद के लिये क्या करूँ जिससे उन्हें सुख की प्राप्ति हो। प्रेम के वशीभूत होकर ही तो वेदान्त का चरम सिद्धान्त ब्रहम, ब्रज-रज में लिपटा नन्द बाबा के यहाँ नाचता है, गोपियों के घर-घर माखन चुराता है।

ग्यानी बोध सुरुप हवै होहिं ब्रहम में लीन।
निरखत पै लीला मधुर प्रेमी प्रेम प्रवीन॥
ग्यानी ढ़िंग गंभीर हरि सच्चिद ब्रह्मानंद।
प्रेमी संग खेलत सदा चंचल प्रेमानंद॥
ग्यानी ब्रह्मानंद सों रहत सदा भरपूर।
पै प्रेमी निरखत सुखद दुरलभ हरि कौ नूर॥
प्रेमी भाग्य सराहीं मुनि, ग्यानी बिमल बिबेक।
चहै सुदुरलभ प्रेमपद तजि निजपद की टेक॥

नेति-नेति !
जय जय श्री राधे !



Love is the link connecting the soul with the divine. Love is a supernatural element and pure love can happen only with God. The feeling of love can be felt only a little bit by the joy of the heart and the tears of love filled in the eyes. Love is not a matter of speech, that is, speech is completely incapable of describing it. Love resides in the heart. There is no place for selfishness in love. Where there is a desire to get anything from the beloved, then surely sex is polluting the sacred seat of love. In love you have to give, there is no concept of receiving. Love grows continuously because a lover can never believe that I have complete love. He only sees a constant lack in his love. If you are in love with one’s quality, form or any hope, and when the quality, form and hope declines, then love starts decreasing, then it is not really love at all. And…….Bina Prem Rizhain Nahi Shri Natwar Nandkishore.

May love always grow as Sasikala Suvesh. Pai pooon ya me no, tateen kabhun na sesh.

Just as a dumb cannot describe the taste of sugar candy, one can only feel the difference; Can’t tell anyone. Increasingly, a situation comes when the distinction between lover and beloved also disappears.

In Baathan in Ghatan, in Beethin in Bagan, In the bun in the garden in Belin in the Brichchan. In Daran in Divaran in Dehri Darichan, In Haran in Haran, in body in Bhushan. In singing in Gopin, in the kunjan in Kanan, In Gokul, in Godhan, in Damini, in the cube. Wherever I look, I see only Siam, Saligram Chhai Raho Nain Mein Mein Mein

The lover constantly thinks about what to do for his beloved so that he can get happiness. Being possessed by love, Brahma, the ultimate principle of Vedanta, dances with Nanda Baba wrapped in Braj-raj, steals butter from house to house of gopis.

Gyani bodh surup havai hohin absorbed in Brahman. Nikhat Pai Leela Sweet lover Prem Praveen Gyani Dhing Gambhir Hari Satchid Brahmananda. Always playful Premanand playing with lover May Gyani Brahmanand remain always full. Pai Lover Nikhat Pleasant Raarabh Hari Kau Noor॥ Lover Bhagya Appreciated Muni, Gyani Bimal Bibek. Chahai beautiful prempad tji nijapad’s take.

Neti-neti! Jai Jai Shri Radhe!

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