
मीराबाई का प्रेम
मीरा कहती है: मेरा हृदय जानता है कि तुम्हें बिना देखे मुझे क्षण भर भी कल नहीं पड़ती। जरा मौका

मीरा कहती है: मेरा हृदय जानता है कि तुम्हें बिना देखे मुझे क्षण भर भी कल नहीं पड़ती। जरा मौका

मीराबाई का जीवन प्रेम और भक्ति की एक ऐसी पराकाष्ठा है, जहाँ लोक-लाज और राजसी वैभव फीके पड़ जाते हैं।

राव दूदाजी अपनी नन्ही पौत्री मीरा की बातें सुनकर स्तब्ध रह गए। कुछ पल तो उनके होंठों से शब्द ही

मीराबाई जी यमुना किनारे जल लेकर लौट रही है धीरे-धीरे भाव जगत में खो गयी उनके नेत्र इधर उधर निहार

एक दिन, मीरा ने भोजराज से कहा,”आपकी आज्ञा हो तो एक निवेदन करूँ।” “क्यों नहीं? फरमाइए।” भोजराज ने अति विनम्रता

बांसुरी सुनूंगी मीरा बाई का भक्ति रस से परिपूर्ण पद भावार्थ और व्याख्या:यह पद भक्त शिरोमणि मीरा बाई की अटूट
मीरा जब वृंदावन पहुंची तो वृंदावन में जो कृष्ण का सबसे प्रमुख मंदिर था, उसका जो पुजारी था, उसने तीस

मेरी दृष्टि वक्ष पर टिकी और तनिक भी प्रतिकार न करते देखकर उन्होंने भी अपने वक्ष की ओर माथा झुकाया-

ऐसी बात सोच कर आप तनिक भी दु:खी न हों।हम सभी एक ही प्रभु की संतान हैं और उन्हें हमारे
‘ए बँदरिया दूर हो’- उन्होंने चिल्लाकर कहा।‘क्यों तुम्हारे बाप का राज है यहाँ?’- मैने कहा।‘जरा इधर आ, फिर बताऊँ कि