भगवान (Bhagvan)

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[91]”श्रीचैतन्य–चरितावली”

।। श्रीहरि:।। [भज] निताई-गौर राधेश्याम [जप] हरेकृष्ण हरेरामश्रीगोपीनाथ क्षीरचोर यस्‍मै दातुं चोरयन् क्षीरभाण्‍डंगोपीनाथ: क्षीरचोराभिधोऽभूत्।श्रीगोपाल: प्रादुरासीद् वश: सन्यत्‍प्रेम्‍णा तं माधवेन्‍द्रं नतोऽस्मि।।

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[90]”श्रीचैतन्य–चरितावली”

।। श्रीहरि:।। [भज] निताई-गौर राधेश्याम [जप] हरेकृष्ण हरेराममहाप्रभु का प्रेमोन्‍माद और नित्‍यानन्‍दजी द्वारा दण्‍ड–भंग पातालं वज्र याहि वासवपुरीमारोह मेरो: शिर:पारावारपरम्‍परास्‍तर

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[89]”श्रीचैतन्य–चरितावली”

।। श्रीहरि:।। [भज] निताई-गौर राधेश्याम [जप] हरेकृष्ण हरेरामपुरी के पथ में मा याहीत्‍यपमंगलं वज्र सखे स्‍नेहेन हीनं वच-स्तिष्‍ठेति प्रभुता यथारुचि

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[88″श्रीचैतन्य–चरितावली”

।। श्रीहरि:।। [भज] निताई-गौर राधेश्याम [जप] हरेकृष्ण हरेरामपुरी-गमन के पूर्व श्री‍कृष्‍णचरणाम्भोजं सत्यमेव विजानताम्।जगत् सत्यमसत्यं वा नेतरेति मतिर्मम ।। भगवान का

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[87]”श्रीचैतन्य–चरितावली”

।। श्रीहरि:।। [भज] निताई-गौर राधेश्याम [जप] हरेकृष्ण हरेरामशचीमाता का संन्यासी पुत्र के प्रति मातृ-स्नेह शीलानि ते चन्दनशीतलानिश्रुतानि भूमितलविश्रुतानि।तथापि जीर्णों पितरावतस्मिन्विहाय

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[86]”श्रीचैतन्य–चरितावली”

।। श्रीहरि:।। [भज] निताई-गौर राधेश्याम [जप] हरेकृष्ण हरेराममाता को संन्यासी पुत्र के दर्शन यस्यास्ति वैष्‍णव: पुत्र: पुत्रिणी साभिधीयते।अवैष्‍णवपुत्रशता जननी शूकरीसमा।।

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[85]”श्रीचैतन्य–चरितावली”

।। श्रीहरि:।। [भज] निताई-गौर राधेश्याम [जप] हरेकृष्ण हरेरामशान्तिपुर में अद्वैताचार्य के घर न्यासं विधायोत्प्रणयोऽथ गौरोवृन्दावन गन्तुमना भ्रमाद् य:।राढे़ भ्रमन् शान्तिपुरीमयित्वाललास

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[84]”श्रीचैतन्य–चरितावली”

।। श्रीहरि:।। [भज] निताई-गौर राधेश्याम [जप] हरेकृष्ण हरेरामराढ़-देश में उन्मत्त-भ्रमण एतां समास्थाय परात्मनिष्‍ठा–मध्‍यासितां पूर्वतमैर्महर्षिभि: ।अहं तरिष्‍यामि दुरन्तपारंतमो मुकुन्दाङ्घ्रिनिषेवयैव।। निशा का

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[83]”श्रीचैतन्य–चरितावली”

।। श्रीहरि:।। [भज] निताई-गौर राधेश्याम [जप] हरेकृष्ण हरेरामश्री‍कृष्‍ण-चैतन्य वैराग्यविद्यानिजभक्तियोग-शिक्षार्थमेक: पुरुष: पुराण:।श्रीकृष्‍णचैतन्यशरीरधारीकृपाम्बुधिर्यस्तमहं प्रपद्ये।। संन्यास के मानी हैं अग्निमय जीवन। पिछले जीवन

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[82]”श्रीचैतन्य–चरितावली”

।। श्रीहरि:।। [भज] निताई-गौर राधेश्याम [जप] हरेकृष्ण हरेरामसंन्यास-दीक्षा देहेऽस्थिमांसरुधिरेऽभिमतिं त्यज त्वंजायासुतादिषु सदा ममतां विमुंच।पश्‍यानिशं जगदिदं क्षणभंगनिष्‍ठंवैराग्यरागरसिको भव भक्तिनिष्‍ठ:।। वैराग्य में

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