
[81]”श्रीचैतन्य–चरितावली”
।। श्रीहरि:।। [भज] निताई-गौर राधेश्याम [जप] हरेकृष्ण हरेरामगौरहरि का संन्यास के लिये आग्रह कुलं च मानं च मनोरमांश्चदारांश्च भक्तान् रूदतीं

।। श्रीहरि:।। [भज] निताई-गौर राधेश्याम [जप] हरेकृष्ण हरेरामगौरहरि का संन्यास के लिये आग्रह कुलं च मानं च मनोरमांश्चदारांश्च भक्तान् रूदतीं

।। श्रीहरि:।। [भज] निताई-गौर राधेश्याम [जप] हरेकृष्ण हरेरामहाहाकार हा नाथ रमण प्रेष्ठ क्वासि क्वासि महाभुज।दास्यास्ते कृपणाया मे सखे दर्शय सन्निधिम्।।

।। श्रीहरि:।। [भज] निताई-गौर राधेश्याम [जप] हरेकृष्ण हरेरामविष्णुप्रिया और गौरहरि यस्यानुरागललितस्मितवल्गुमन्त्र-लीलावलोकपरिरम्भणरासगोष्ठ्याम्।नीता: स्म न:क्षणमिव विना तंगोप्य: कथं न्वतितरेम तमो दुरन्तम्।। पितृगृह

।। श्रीहरि:।। [भज] निताई-गौर राधेश्याम [जप] हरेकृष्ण हरेरामशचीमाता और गौरहरि अहो विधतस्तव न क्वचिद्दयासंयोज्य मैत्र्या प्रणयेन देहिन:।तांश्चाकृतार्थान्वियुनड़्क्ष्यपार्थकंविक्रीडितं तेऽर्भकचेष्टितं यथा।। भक्तों

।। श्रीहरि:।। [भज] निताई-गौर राधेश्याम [जप] हरेकृष्ण हरेरामभक्तवृन्द और गौरहरि निवारयाम: समुपेत्य माधवंकिं नोऽकरिष्यन् कुलवृद्धबान्धवा:।मुकुन्दसंगान्निमिषार्धदुस्त्यजाद्दैवेन विध्वंसितदीनचेतसाम्।। महाप्रभु का वैराग्य दिनों

।। श्रीहरि:।। [भज] निताई-गौर राधेश्याम [जप] हरेकृष्ण हरेरामसंन्यास से पूर्व तत् साधु मन्येऽसुरवर्य देहिनांसदा समुद्विग्नधियामसद्ग्रहात्।हित्वाऽऽत्मपातं गृहमन्धकूपंवनं गतो यद्धरिमाश्रयेत।। महाप्रभु का

।। श्रीहरि:।। [भज] निताई-गौर राधेश्याम [जप] हरेकृष्ण हरेरामनवानुराग और गोपी-भाव क्वचिदुत्पुलकस्तूष्णीमास्ते संस्पर्शनिर्वृत:।अस्पन्दप्रणयानन्दसलिलामीलितेक्षण:।।आसीन: पर्यटन्नश्नञ्शयान: प्रपिबन् ब्रुवन्।नानुसंधत्त एतानि गोविन्दपरिरम्भित:।। महाप्रभु जब से

।। श्रीहरि:।। [भज] निताई-गौर राधेश्याम [जप] हरेकृष्ण हरेरामभक्तों की लीलाएँ तत्तद्भावानुमाधुर्य्ये श्रुते धीर्यदपेक्षते ।नात्र शास्त्रं न युक्तिंच तल्लोभोत्पत्तिलक्षणम् ।। प्रकृति

।। श्रीहरि:।। [भज] निताई-गौर राधेश्याम [जप] हरेकृष्ण हरेरामपरम सहृदय निमाई की निर्दयता वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि।लोकोत्तराणां चेतांसि को हि विज्ञातुमीश्वर:।।

।। श्रीहरि:।। [भज] निताई-गौर राधेश्याम [जप] हरेकृष्ण हरेरामक़ाज़ी की शरणागति वन्दे स्वैराद्भुतेअहं तं चैतन्यं यत्प्रसादत:।यवना: सुमनायन्ते कृष्णनामप्रजल्पका:।। बिना मुकुट के