
पुरब से जब सुरज निकले
पुरब से जब सुरज निकले, सिंदूरी घन छाये पवन के पग में नुपुर बाजे, मयुर मन मेरा गाये मन मेरा

पुरब से जब सुरज निकले, सिंदूरी घन छाये पवन के पग में नुपुर बाजे, मयुर मन मेरा गाये मन मेरा

घुट रही भोले तेरी भांग सोने के लोटे में भोले तेरी भांग पीने गनपत जी भी आये गनपत जी भी

लिङ्गाष्टकम् ब्रह्ममुरारिसुरार्चितलिङ्गम् निर्मलभासितशोभितलिङ्गम् । जन्मजदुःखविनाशकलिङ्गम् तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥१॥ देवमुनिप्रवरार्चितलिङ्गम् कामदहम् करुणाकरलिङ्गम् । रावणदर्पविनाशनलिङ्गम् तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥२॥ सर्वसुगन्धिसुलेपितलिङ्गम् बुद्धिविवर्धनकारणलिङ्गम्

हे भोले शंकर पधारो बैठे छिप के कहाँ । गंगा जटा में तुम्हारी, हम प्यासे यहाँ ॥ महा सती के

नशा नाम दा पिला दे मेनू मस्त बना दे, एसी तू प्यार दी चरादे मेनू तू भंग, मस्त मलांग करे

नमामि द्वादश ज्योर्तिलिँगमः नमामि उमापति सोमनाथम् , नमामि गौरीपति मल्लिकार्जुनम् , नमामि गिरिजापति महाकालेश्वरम् , नमामि भवानीपति ओमकारेश्वरम् , नमामि

भगवान मेरी नाय को उस पार लगा देना, अब तक तूने नबाया है आगे भी निभा देना, छल बल के

प्रभु मेरे मन को बना दे शिवाला, तेरे नाम की मैं जपूं रोज माला । अब तो मनो कामना है

जिथे साड़ी लगी आ तू लगी रेहन दे, लोकी कहन्दे मन्दी एह ते मन्दी रेहन दे, अगर मान जाता मनाने

सारी दुनिया परख ले मैं तेरी मस्ती होर, ओ बाबा पौनहारियाँ मैनु तेरी ही वस् लोड, शाहतलाइयाँ चिंता वज्दा वज्दा