
भागवत रहस्य-01-
सच्चिदानंदरूपाय विश्वोत्पत्यादिहेतवे ।तापत्रयविनाशाय श्री कृष्णाय वयं नुमः ।। (माहात्म्य अ- 1 श्लोक -1) जो जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश

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श्री हरि: गत पोस्ट से आगे…निष्पाप पुरुषो ! शूद्र की भुजाओं में अंगरागादि कामोद्दीपक वस्तुएँ लगि हुई थीं और वह

चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथपुरी से दक्षिण भारत की यात्रा पर निकले थे। उन्होंने एक स्थान पर देखा कि सरोवर के किनारे

श्री हरि: गत पोस्ट से आगे………..जो जीव अज्ञानवश काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर – इन छ: शत्रुओं पर विजय

श्री हरि: गत पोस्ट से आगे………..इस लोक में जो मनुष्य जिस प्रकार का और जितना अधर्म और धर्म करता है,

यह लेख ज्योतिष प्रयोग में शनि एवं शनि देवता के बारे में है। अन्य प्रयोग हेतु के लिए, शनि देखें।शनि

श्री हरि: गत पोस्ट से आगे………..श्रीशुकदेवजी कहते हैं – परीक्षित ! जब यमदूतों ने इस प्रकार कहा, तब भगवान् नारायण

.अयोध्या के बहुत निकट ही पौराणिक नदी कुटिला है – जिसे आज टेढ़ी कहते हैं, उसके तट के निकट ही

श्री हरि: गत पोस्ट से आगे………..वह मूर्ख इसी प्रकार अपना जीवन बिता रहा था कि मृत्यु का समय आ पहुँचा

भगवान् का प्रकट होकर गोपियों को सान्त्वना देना भगवान की प्यारी गोपियाँ विरह के आवेश में इस प्रकार भाँति-भाँति से