श्रीमदभागवतमहापुराण में भगवन्नाम महिमा
( पोस्ट 6 )

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श्री हरि:
गत पोस्ट से आगे………..
इस लोक में जो मनुष्य जिस प्रकार का और जितना अधर्म और धर्म करता है, वह परलोक में उसका उतना और वैसा ही फल भोगता है ||४५|| देवशिरोमणियो ! सत्व, रज और तम – इन तीन गुणों के भेद के कारण इस लोक में भी तीन प्रकार के प्राणी दीख पड़ते हैं – पुण्यात्मा, पापात्मा और पुण्य-पाप दोनों से युक्त, अथवा सुखी, दु:खी और सुख-दु:ख दोनों से युक्त; वैसे ही परलोक में भी उनकी त्रिविधता का अनुमान किया जाता है ||४६|| वर्तमान का समय ही भूत और भविष्य का अनुमान करा देता है | वैसे ही वर्तमान जन्म के पाप-पुण्य भी भूत और भविष्य जन्मों के पाप-पुण्य का अनुमान करा देते हैं ||४७|| हमारे स्वामी अजन्मा भगवान् सर्वज्ञ यमराज सबके अन्त:करणों में ही विराजमान हैं | इसलिये वे अपने मन से ही सबके पूर्वरूपों को देख लेते हैं | वे साथ ही उनके भावी स्वरूप का भी विचार कर लेते हैं ||४८|| जैसे सोया हुआ अज्ञानी पुरुष स्वप्न के समय प्रतीत हो रहे कल्पित शरीर को ही अपना वास्तविक शरीर समझता है, सोते हुए अथवा जागनेवाले शरीर को भूल जाता है, वैसे ही जीव भी अपने पूर्वजन्मों की याद भूल जाता है | और वर्तमान शरीर के सिवाय पहले और पिछले शरीरों के सम्बन्ध में कुछ भी नहीं जानता ||४९|| सिध्दपुरुषो ! जीव इस शरीर में पाँच कर्मेन्द्रियों से लेना-देना, चलना-फिरना आदि काम करता है, पाँच ज्ञानेन्द्रियों से रूप-रस आदि पाँच विषयों का अनुभव करता है और सोलहवें मन के साथ सत्रहवाँ वह स्वयं मिलकर अकेले ही, मन, ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय – इन तीनों के विषयों को भोगता है ||५०|| जिव का यह सोलह कला और सत्वादि तीन गुणोंवाला लिंग शरीर अनादि है | यही जीव को बार-बार हर्ष, शोक, भय और पीड़ा देने वाले जन्म-मृत्यु के चक्कर में डालता है ||५१||

शेष आगामी पोस्ट में |
गीताप्रेस, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित पुस्तक परम सेवा पुस्तक कोड १९४४ से |



Mr. Hari: Continuing from previous post……….. Whatever type of unrighteousness and righteousness a person commits in this world, he enjoys the same and the same fruit in the hereafter. Devshiromanis! Due to the difference between these three gunas – sattva, rajas and tamas, three types of beings are seen in this world too – virtuous, having both virtue and sin, or happy, unhappy and both happiness and sorrow. containing; In the same way, their trinity is also estimated in the afterlife ||46|| It is the time of the present that predicts the past and the future. Similarly, the sins and virtues of the present birth also give an estimate of the sins and virtues of the past and future births. Our lord, the unborn Lord, the omniscient Yamraj, is seated in everyone’s conscience. That is why they see all the former forms with their own mind. At the same time, they also consider their future form ||48|| Just as a sleeping ignorant person considers the imaginary body visible at the time of dream as his real body, forgets the sleeping or waking body, so also the soul forgets the memory of his previous births. and does not know anything about the earlier and previous bodies except the present body ||49|| Perfect men! The living entity deals with the five sense organs, moves, etc., experiences the five objects of form and taste with the five sense organs, and the seventeenth with the sixteenth mind, he himself alone, together with the mind, sense organs and action – enjoys the subjects of these three ||50|| This sixteen arts of the Jiva and the three gunas of Satvadi is the linga body from time immemorial. This puts the soul in the cycle of birth and death, which gives joy, sorrow, fear and pain again and again ||51|| rest in upcoming posts. From the book Param Seva Book Code 1944 published by GeetaPress, Gorakhpur.

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