
सोचो, समझो, फिर करो
सोचो, समझो, फिर करो संस्कृत-काव्यपरम्परामें भारवि नामके एक प्रसिद्ध कवि हुए हैं। उनका ‘किरातार्जुनीयम्’ नामसे प्रसिद्ध महाकाव्य है। इसमें महाभारतकी

सोचो, समझो, फिर करो संस्कृत-काव्यपरम्परामें भारवि नामके एक प्रसिद्ध कवि हुए हैं। उनका ‘किरातार्जुनीयम्’ नामसे प्रसिद्ध महाकाव्य है। इसमें महाभारतकी

एक ब्राह्मणके दो पुत्र थे। दोनोंके विधिपूर्वक यज्ञोपवीतादि सभी संस्कार हुए थे। उनमें ब्राह्मणका बड़ा पुत्र तो यज्ञोपवीत संस्कारके पश्चात्

बिगानी छाछपर मूँछें एक समयकी बात है। एक किसान किसी दूरके गाँवमें भैंस खरीदनेके लिये गया। उस समय गाँवोंमें न

रँगी लोमड़ी एक लोमड़ी खानेकी तलाशमें एक गाँवमें घुस गयी। वह एक रंगरेजके घरके पिछवाड़े में चली गयी, जहाँपर रंगसे

जार्ज मूलरका प्रार्थनामें अटल विश्वास था अपने जीवनमें उन्हें किसी भी दिन निराश नहीं होना पड़ा। एक समयकी बात ।

सुख के माथे सिल परौ जो नाम हृदय से जाय। बलिहारी वा दुःख की जो पल-पल नाम रटाय ॥ महाभारतका

एक बार मुनियोंमें परस्पर इस विषयपर बड़ा विवाद हुआ कि ‘किस समय थोड़ा-सा भी पुण्य अत्यधिक फलदायक होता है तथा

सरयूके स्वच्छ पुलिनपर चक्रवर्तीजीके चारों कुमार खेलने आये थे सखाओंके साथ समस्त बालकोंका विभाजन हो गया दो दलोंमें एक दलके