
अपरिग्रह
संत अफ्ररायतका जीवन अत्यन्त सरल था, वे बड़ी पवित्रतासे रहते थे। अपनी जन्मभूमि फारसका परित्याग कर वे सीरिया चले आये

संत अफ्ररायतका जीवन अत्यन्त सरल था, वे बड़ी पवित्रतासे रहते थे। अपनी जन्मभूमि फारसका परित्याग कर वे सीरिया चले आये

पाण्डव वनवासका जीवन व्यतीत कर रहे थे। भगवान् व्यासकी प्रेरणासे अर्जुन अपने भाइयोंकी आजा लेकर तपस्या करने गये तप करके

ब्राह्मणके धनका हरण नहीं करना चाहिये प्राचीन कालमें एक स्थानपर एक सियार और एक वानर रहते थे। दोनोंको अपने पूर्वजन्मकी

एक साधु नगरसे बाहर कुटियामें रहते थे। परंतु भिक्षा माँगने तो उन्हें नगरमें आना ही पड़ता था । मार्गमें एक

राजा विश्वामित्र सेनाके साथ आखेटके लिये निकले थे। वनमें घूमते हुए वे महर्षि वसिष्ठके आश्रमके समीप पहुँच गये। महर्षिने उनका

महाराज उत्तानपादके विरक्त होकर वनमें तपस्या करनेके लिये चले जानेपर ध्रुव सम्राट् हुए। उनके सौतेले भाई उत्तम वनमें आखेट करने

वृन्दावनके पास एक ब्राह्मण रहता था। एक समय ऐसा आया कि उसके सभी घरवालों की मृत्यु हो गया। केवल वही

उसके केश और वस्त्र भीगे हुए थे। मुखपर बड़ी उदासी और मनमें अत्यन्त खिलता थी। उसके में जिज्ञासाका चित्र था

श्री ईश्वरचन्द्र विद्यासागर मार्ग चलते समय भी देखते जाते थे कि किसीको उनकी सेवाकी आवश्यकता तो नहीं है। एक दिन

देनेका संस्कार एक सन्तने एक द्वारपर आवाज लगायी- ‘भिक्षां देहि ।’ एक छोटी-सी बच्ची बाहर आयी और बोली ‘बाबा! हम