
मृतकके प्रति सहानुभूति
लगभग ढाई हजार वर्ष पहलेकी बात है। चीनके महान् तत्त्वविवेचक महात्मा कनफ्युसियसने घोड़ागाड़ीसे वी नगरमें प्रवेश ही किया था कि

लगभग ढाई हजार वर्ष पहलेकी बात है। चीनके महान् तत्त्वविवेचक महात्मा कनफ्युसियसने घोड़ागाड़ीसे वी नगरमें प्रवेश ही किया था कि

एक संत थे। विचित्र जीवन था उनका। वे हरेकसे अपनेको अधम समझते और हरेकको अपनेसे उत्तम । घूमते-फिरते एक दिन

कलकत्तेके कुछ कॉलेजके विद्यार्थी वहाँका ‘फोर्ट विलियम’ किला देखने गये थे। सहसा उनके एक साथीके शरीरमें पीड़ा होने लगी। उसने

दण्डमें ईखका खेत समर्थ गुरु श्रीरामदास थे छत्रपति शिवाजी महाराजक गुरु । एक बार वे अपने चेलोंके साथ शिवाजीके पास

कर्णका वास्तविक नाम तो वसुषेण था। माताके गर्भसे वसुषेण दिव्य कवच और कुण्डल पहिने उत्पन्न हुए थे। उनका यह कवच,

प्राचीन अरबनिवासियोंमें हातिम ताईका नाम अत्यन्त प्रसिद्ध है। वह अपनी अमित दातृत्व-शक्ति किंवा सतत दानशीलताके लिये बड़ा विख्यात था। एक

एक महिला थी। उसका नाम था कान्हबाई वह श्रीकृष्णके बाल रूपकी भक्ति करती थी। कहा जाता है कि जब वह

(5) सेवककी सूझ-बूझका प्रभाव एक राजाके पास तीन मूर्तियाँ थी। एक दिन एक राजाके पास तीन मूर्तियाँ थी। एक दिन

बाणेश्वर महादेवके समक्ष विद्यापति मधुर कण्ठसे कीर्तन करते रहते और आँखोंसे झर-झर अश्रु झरता रहता कखन हरब दुख मोर। हे

महाप्रभु यह सुनकर आश्चर्यचकित हो गये कि भगवद्-विग्रहके राजभोगके लिये द्रव्यका अभाव हो चला है। ‘सोनेकी कटोरी गिरवी रख दी