
बोध-सूक्ति- पीयूष
बोध-सूक्ति- पीयूष ‘अनिर्वेदः सिद्धेर्मूलम् ॥’-निराशाका अभाव हो सफलताका मूल है। ‘न सन्देहदेहो वीरव्रतनिर्वाहः ॥ ‘ – वीरोचित आचरण संशयग्रस्त मनसे

बोध-सूक्ति- पीयूष ‘अनिर्वेदः सिद्धेर्मूलम् ॥’-निराशाका अभाव हो सफलताका मूल है। ‘न सन्देहदेहो वीरव्रतनिर्वाहः ॥ ‘ – वीरोचित आचरण संशयग्रस्त मनसे

दम्भ पतनका कारण रावणने ऐसी तपस्या की थी, जो सभीके लिये दुःसह थी। महादेवजीको तपस्या बहुत प्रिय है। वे उसकी

रोजन गाँवमें एक ब्राह्मण नित्य बात-बातपर पत्नी से झगड़ता और जब-तब कहता नहीं मानोगी तो संतोबा पवारके पास चला जाऊँगा;

गुजरातकी प्रसिद्ध राजमाता मीणलदेवी बड़ी उदार थी। वह सवा करोड़ सोनेकी मोहरें लेकर सोमनाथजीका दर्शन करने गयी। वहाँ जाकर उसने

नगरका नाम और ठीक समय स्मरण नहीं है। वर्षा ऋतु बीती जा रही थी; किंतु वर्षा नहीं हुई थी। किसानों

23 मार्च 1931 की रातमें लाहौर जेलमें भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरुको श्रीगांधीजी आदिकी लाख चेष्टाके बाद भी फाँसी दे

समस्या चट्टान-सी पुराने समयकी बात है। माधोपुर गाँवमें एक किसान माधवनाथ रहता था। उसके पास खेती करनेके लिये एक बड़ा-सा

एक नवशिक्षित शहरी बाबू नदीमें नावपर जा रहे थे। उन्होंने आकाशकी ओर ताककर केवटसे कहा – ‘भैया! तुम नक्षत्रविद्या जानते

केवल लक्ष्यपर ध्यान लगाओ एक बार स्वामी विवेकानन्द अमेरिकामें भ्रमण कर रहे थे। अचानक एक जगहसे गुजरते हुए उन्होंने पुलपर

परम पूज्यपाद प्रातः स्मरणीय पं0 श्रीडूंगरदत्तजी | महाराज बड़े ही उच्चकोटिके विद्वान् परम त्यागी, तपस्वी, पूर्ण सदाचारी, कर्मकाण्डी, अनन्य भगवद्भक्त