वामन भगवान



परमात्मा जब द्वार पर पधारते हैं, तो तीन वस्तुएँ माँगते हैं तीन कदम पृथ्वी अर्थात् तन,मन और धन, इन तीनों का भगवान को अर्पण करना चाहिए।तन से सेवा करने पर देहाभिमान नष्ट होता जायेगा और अहंकार समाप्त होगा, मन से सेवा करने पर श्रम नहीं करना पड़ेगा, धन से सेवा करने पर धन की माया- ममता – मोह नष्ट होगा, तन, मन, धन से सेवा करने पर ही जीव और ब्रह्म का मिलन होता है।

अतः इन तीनो से भगवान की सेवा करनी
चाहिए, सभी वस्तुएँ भगवान की है-

ईशावास्यमिदं सर्वं यत् किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा: मा गृधः कस्यस्विद् धनम्।।

जो कुछ भी इस दुनिया में है, वह सब ईश्वर का है. इसलिए हमें ईश्वर के दिए गए पदार्थों का त्याग करके उनका भोग करना चाहिए। अतः उन्हें ही अर्पित करनी चाहिए, उन्हीं का दिया हुआ उन्हें देना है-

त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये।
गृहाण सम्मुखो भूत्वा प्रसीद परमेश्वर।।

अर्थात् हे गोविन्द, आपका ही सब दिया हुआ है,जो आपको ही समर्पित कर रहे हैं, हे परमेश्वर, आपके मुख के सामने जो भी है, उसे प्रसन्नता से ग्रहण करें।जो व्यक्ति बलि की भाँति तन,मन एवं धन भगवान को अर्पित करता है , भगवान उसके द्वारपाल बनते हैं अर्थात् प्रत्येक इन्द्रिय के दरवाजे पर खड़े रहकर नारायण भगवान उसकी रक्षा करते हैं, और इन्द्रिय मार्ग से काम का प्रवेश नहीं हो पाता।

तीन चरण पृथ्वी का एक अर्थ है – सत,रज एवं तम इन तीन गुणों को भगवान को अर्पित करना चाहिए, शरीर से सेवा करने तमोगुण घटता है, ईश्वर सेवा में धन का उपयोग करने से रजोगुण कम होगा, यदि तन और धन
दिया जाय तथा मन न दिया जाय तो प्रभु प्रसन्न नहीं होते।अतः सत्वगुण के क्षय हेतु मन से भी प्रभु की सेवा करनी चाहिए, मन विषयों में और तन ठाकुर जी के पास होगा,तो ईश्वर को आनन्द नहीं आयेगा, सेवा करते समय यदि आँखो में आँसू आ जायँ तो समझना चाहिए कि ठाकुर जी ने कृपा की है।ज्ञानी व्यक्ति ईश्वर के साथ शरीर से नहीं मन से सम्बन्ध जोड़ता है, समर्पणकर्ता को अपने आपको भी समर्पण करना चाहिए, सब करने के बाद भी यह मानना चाहिए कि हमने कुछ भी नहीं किया –

मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरं।
यत्पूजितं मया देव परिपूर्ण तदस्तुमे।। || वामन अवतार की जय हो ||



When God visits the gate, then three things ask for three steps, the earth, mind and wealth, these three should be offered to God. On serving with the following, the heart will be destroyed and the ego will end, when served with the mind. You will not have to do labor, after serving with money, Maya – Mamta – fascination will be destroyed, only by serving with body, mind, wealth, the union of creature and Brahma.

So serve God with these three Should, all things belong to God-

This is all that is in the world and in the world. Enjoy what he has given up and do not covet anyone’s wealth.

Whatever is in this world, it is all of God. Therefore, we should renounce the given substances of God and enjoy them. Therefore, they should be offered to them, they have to give them- they have to give them-

I offer you this thing, O Govinda, to you alone. Take me in front of you, O Lord.

That is, O Govind, it is given to you, who are dedicating you, O God, whoever is in front of your face, accept it with happiness. It is, God becomes his gatekeepers, that is, by standing at the door of each senses, Narayan God protects him, and the work is not able to enter the work.

Three stages are a meaning of the Earth – Sat, Raj and Tama should offer these three qualities to God, to serve from the body, it decreases, using money in God service will reduce Rajoguna, if body and money If the mind is given and the mind is not given, then the Lord is not pleased. Therefore, for the decay of sattvaguna, one should also serve the Lord with the mind, the mind will be in the subjects and the Tan Thakur ji, then God will not enjoy, if the eyes are served, if the eyes are served If tears come, then it should be understood that Thakur ji has blessed. A person connects a relationship with the mind, not the body with God, the dedicator should also surrender himself, even after doing it, we should believe that we should believe that we Nothing did –

Without mantras, without action, without devotion, Lord of the gods. May that which I have worshiped, O Lord, be perfect. || Jai ho Vamana Avatar ||

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