भगवान श्री कृष्ण कहते हैं,हमे दूसरे के बारे में जानने की बहुत जिज्ञासा रहती है। कभी हम यह जानने की कोशिश नही करते कि आखिर हम कौंन है, जिस दिन हम स्वयं को खोज लेगे , अपने आप को पहचान लेगें अपने भीतर झांककर जान लेंगे कि हम कौन है?उसी दिन से वैराग्य होने लगेगा।
गृहस्थ मे रह कर भी बैराग्य होना जीवन का प्रभु से मिलन है।यह भी सन्यास का ही रूप है। यह मिलन तभी सम्भव है जब हम भीतर जान लें कि हम कौंन है?
हम, आप और समस्त प्राणी परमात्मा के अंश है, संसार के भौतिक सुख ने हमें ऐसे आवरण से ढक दिया है।ब्रह्माण्ड की अद्भुत रचना हम है,स्वयं को पहचानें, जाने,ईश्वर को जाने तभी सद्गति है तभी मोक्ष है।सन्यास तभी पूर्ण माना जाता है, जब हमें यह ज्ञात हो कि संसार की प्रत्येक वस्तु भगवान की है, और भगवान के सिवाय कोई भी किसी भी वस्तु का स्वामित्व ग्रहण नही कर सकता।वस्तुतः भक्त को यह समझना चाहिए कि उसका अपना कुछ नही है।वह सन्यासी की भांति केवल आवश्यक वस्तुओं का भोग करने इस संसार मे आया है।इस प्रकार का जीवन यापन करना सन्यासी के वैराग्य से कही अधिक उत्तम है।जो मनुष्य भगवान के प्रति भक्ति में लीन रहता है।वह ऐसी अवस्था को प्राप्त हुआ रहता है, जहाँ से वह शरीर त्यागने के बाद भगवद धाम जाता है और श्री कृष्ण के चरणों में गति पा लेता है।जिस प्रकार भगवान कृष्ण आलोचनाओं से परे है, उसी प्रकार उनका भक्त भी सारी भौतिक आलोचनाओ से मुक्त हो जाता है। यदि हम मन को साध लें तो फिर भले हम गृहस्थ हैं, वानप्रस्थी हैं या संन्यासी, हमें मोक्ष मिल जाएगा। यह एक मानसिक अवस्था है कि हम सोचते हैं कि मैं गृहस्थ हूं और वह संन्यासी है। वास्तव में यह एक विचार है जो हमारा पीछा करता है। कोई मनुष्य भले ही संसार का त्याग कर संन्यासी बन जाए, फिर भी यदि विचार नहीं बदला तो जंगल भी घर हो जाएगा, जबकि यदि विचार बदल गया तो घर में रहकर भी संन्यास की साधना की जा सकती है। अतः स्वयं को खोजो,जानो,पहचानो कि मै कौन हूं और यहां किस प्रयोजन से आया हूं? जय जय श्री राधेकृष्ण जी।श्री हरि आपका कल्याण करें।













