शीलवतीकी कथा

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शीलवतीकी कथा

नदीके किनारे बसे किसी नगरमें एक वणिक् कुटुम्ब निवास करता था। उस परिवारमें चार जन थे— ससुर-सास और पुत्र-पुत्रवधू पुत्रका नाम था अजितसेन और बहूका नाम था शीलवती अजितसेन व्यापारके सिलसिले में प्रायः बाहर जाता आता था और शीलवती घरपर सास-ससुरकी सेवामें रहती हुई अपना नाम चरितार्थ करती थी।
एक दिन शीलवती आधी रातके बाद खाली घड़ा लेकर घरसे बाहर गयी और बहुत देर बाद वापस लौटी। उसके ससुरको जब इस बातका पता चला तो उसे अपनी पुत्रवधू शीलवतीके चरित्रपर शंका हुई। उसने विचार किया कि पुत्र आजकल बाहर गया हुआ है और बहूका यह आचरण आपत्तिजनक है। इससे मेरा पवित्र कुल कलंकित हो जायगा। अतः दुश्चरित्र बहूको घरमें रखना ठीक नहीं है। उसने अपनी पत्नीसे इस बारेमें परामर्श किया और उसकी सहमति पाकर बहूको रथमें बैठाकर स्वयं हाँकते हुए उसे नैहर पहुँचाने चल पड़ा। मार्गमें । एक छोटी नदी आयी। ससुरने पुत्रवधूसे कहा – ‘तुम
रथसे उतरकर जूते उतारकर नदी पार करो।’ किंतु शीलवतीने जूते नहीं उतारे और पहने ही नदी पार कर गयी। ससुरने विचार किया कि यह दुश्चरित्र होनेके साथ ही अविनीत भी है।
आगे चलनेपर मार्गके किनारे एक बड़ा खेत मिला, जिसमें खूब फली हुई मूँगकी फसल लहलहा रही थी। ससुरने किसानके भाग्यकी प्रशंसा करते हुए कहा- ‘देखो, यह खेत कितना अच्छा फला है। खेतका मालिक इससे खूब मुनाफा कमायेगा।’ शीलवतीने कहा- ‘आपकी बात तो ठीक है, किंतु यदि यह जंगली जानवरोंसे खाया न जाय तो ।’ ससुरको बहूकी बात अटपटी लगी- ‘कैसी बेतुकी बातें करती है? मालिक रखवाली तो करता ही होगा।’ कुछ देरतक दोनों चुपचाप चलते रहे। कुछ दूर रास्ता तय करनेके बाद वे एक नगरमें पहुँचे । वहाँके लोगोंको आनन्दमग्न देखकर ससुरके मुँह से निकला – ‘देखो, यह नगर कितना सुन्दर है!’ शीलवतीने कहा-‘आपकी बात तो ठीक है, परंतु यदि इसे उजाड़ा न जाय तो ।’ ससुर अपनी बहूकी बकवाससे मन-ही-मन कुपित हुआ। कुछ दूर आगे चलनेपर एक कुलपुत्र दिखायी पड़ा। ससुरने उसकी प्रशंसा करते हुए कहा-‘यह तो बहुत शूरवीर लगता है।’ शीलवती तत्काल बोल पड़ी-‘यदि कहीं पीटा न जाय तो ।
कुछ दूर आगे चलनेपर ससुर रथ रोककर एक वटवृक्षके नीचे विश्राम करने बैठ गया। शीलवती बरगदसे दूर हटकर जा बैठी। ससुर सोचने लगा कि यह हमेशा उलटा ही बात-व्यवहार करती है। कुछ देर विश्राम करनेके पश्चात् वे आगे बढ़े तो शीलवतीका ननिहाल आया। उस गाँवमें प्रवेश करते ही बीच रास्तेमें शीलवतीका मामा मिल गया। वह शीलवतीको देखकर बहुत प्रसन्न हुआ और दोनोंको आदरपूर्वक अपने घर ले गया। वहाँ भोजन करनेके पश्चात् शीलवतीका ससुर अपने रथमें ही लेट गया। ससुरको रथमें लेटा देखकर शीलवती भी घरके अन्दर नहीं गयी, अपितु रथकी छायामें ही बैठ गयी। इसी समय घरके बगलमें उगे की कथा *

बबूल के पेड़पर बैठकर एक कौवा काँव-काँव करने लगा। लगातार काँव-काँवकी आवाज सुनकर शीलवती कहने लगी- ‘अरे! तू थकता क्यों नहीं? एक बार पशुकी बोली सुनकर कार्य करनेसे तो मुझे घरसे निकाला जा रहा है। अब तुम्हारी बोलीके अर्थके अनुसार कार्य करके एक नयी आफत मोल लूँ? कल आधी रातके समय गीदड़की आवाज सुनकर मैं नदीके किनारे गयी और वहाँ जलमें उतराये मुर्देके शरीरसे बहुमूल्य आभूषण उतारकर घर ले आयी। उसके दण्डस्वरूप मेरे ससुर मुझे घरसे निकाल रहे हैं। अरे कौवे ! अब तू कह रहा है कि इस बबूलके पेड़की जड़के पास बहुत सारा सोना गड़ा हुआ है। तो क्या इसे निकालकर फिर एक नयी विपत्ति मोल लूँ?’
शीलवतीका ससुर इस बातको सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ और जाकर बबूलकी जड़के पास खोदकर सारा सोना ले आया तथा बहूकी बड़ाई करने लगा। वह उसे रथमें बैठाकर वापस घरकी ओर ले चला। मार्गमें उसने बहूसे पूछा कि तुम बरगद की छायामें क्यों नहीं बैठी ? शीलवतीने उत्तर दिया कि ‘वृक्षकी जड़में सर्पका भय रहता है और ऊपरसे चिड़ियाँ भी बीट करती हैं। इसलिये दूर बैठना ही बुद्धिमानी है।’ फिर कुलपुत्रके बारेमें पूछने पर उसने बताया कि वास्तविक शूर वही होता है, जो कि पहले प्रहार करता है और वह प्रहार खाली नहीं जाता। इसी प्रकार उसने नगरके सम्बन्धमें बताया कि जिस नगरके लोग आगन्तुक अतिथियोंका स्वागत नहीं करते, उसे वस्तुतः नगर नहीं कहा जाता। नदी पार करनेके सम्बन्धमें उसने कहा ‘नदीमें विषैले जीव-जन्तुओंका भय होता है और पैदीमें कंकड़-पत्थर तथा काँटे होते हैं, जो नंगे पाँवमें चुभ सकते हैं। अतः जूते पहनकर पार करनेमें ही सुरक्षा है। इसीलिये मैंने जूते नहीं उतारे।’
शीलवतीको बुद्धिमत्तासे उसका ससुर बहुत प्रसन्न हुआ और उसमें उसे आदर्श गृहिणीके सभी गुण प्रकट दिखायी दिये। उसने शीलवतीकी प्रशंसा करते हुए उसे घरकी मालकिन बना दिया। [ जैनग्रन्थ]

शीलवतीकी कथा
नदीके किनारे बसे किसी नगरमें एक वणिक् कुटुम्ब निवास करता था। उस परिवारमें चार जन थे— ससुर-सास और पुत्र-पुत्रवधू पुत्रका नाम था अजितसेन और बहूका नाम था शीलवती अजितसेन व्यापारके सिलसिले में प्रायः बाहर जाता आता था और शीलवती घरपर सास-ससुरकी सेवामें रहती हुई अपना नाम चरितार्थ करती थी।
एक दिन शीलवती आधी रातके बाद खाली घड़ा लेकर घरसे बाहर गयी और बहुत देर बाद वापस लौटी। उसके ससुरको जब इस बातका पता चला तो उसे अपनी पुत्रवधू शीलवतीके चरित्रपर शंका हुई। उसने विचार किया कि पुत्र आजकल बाहर गया हुआ है और बहूका यह आचरण आपत्तिजनक है। इससे मेरा पवित्र कुल कलंकित हो जायगा। अतः दुश्चरित्र बहूको घरमें रखना ठीक नहीं है। उसने अपनी पत्नीसे इस बारेमें परामर्श किया और उसकी सहमति पाकर बहूको रथमें बैठाकर स्वयं हाँकते हुए उसे नैहर पहुँचाने चल पड़ा। मार्गमें । एक छोटी नदी आयी। ससुरने पुत्रवधूसे कहा – ‘तुम
रथसे उतरकर जूते उतारकर नदी पार करो।’ किंतु शीलवतीने जूते नहीं उतारे और पहने ही नदी पार कर गयी। ससुरने विचार किया कि यह दुश्चरित्र होनेके साथ ही अविनीत भी है।
आगे चलनेपर मार्गके किनारे एक बड़ा खेत मिला, जिसमें खूब फली हुई मूँगकी फसल लहलहा रही थी। ससुरने किसानके भाग्यकी प्रशंसा करते हुए कहा- ‘देखो, यह खेत कितना अच्छा फला है। खेतका मालिक इससे खूब मुनाफा कमायेगा।’ शीलवतीने कहा- ‘आपकी बात तो ठीक है, किंतु यदि यह जंगली जानवरोंसे खाया न जाय तो ।’ ससुरको बहूकी बात अटपटी लगी- ‘कैसी बेतुकी बातें करती है? मालिक रखवाली तो करता ही होगा।’ कुछ देरतक दोनों चुपचाप चलते रहे। कुछ दूर रास्ता तय करनेके बाद वे एक नगरमें पहुँचे । वहाँके लोगोंको आनन्दमग्न देखकर ससुरके मुँह से निकला – ‘देखो, यह नगर कितना सुन्दर है!’ शीलवतीने कहा-‘आपकी बात तो ठीक है, परंतु यदि इसे उजाड़ा न जाय तो ।’ ससुर अपनी बहूकी बकवाससे मन-ही-मन कुपित हुआ। कुछ दूर आगे चलनेपर एक कुलपुत्र दिखायी पड़ा। ससुरने उसकी प्रशंसा करते हुए कहा-‘यह तो बहुत शूरवीर लगता है।’ शीलवती तत्काल बोल पड़ी-‘यदि कहीं पीटा न जाय तो ।
कुछ दूर आगे चलनेपर ससुर रथ रोककर एक वटवृक्षके नीचे विश्राम करने बैठ गया। शीलवती बरगदसे दूर हटकर जा बैठी। ससुर सोचने लगा कि यह हमेशा उलटा ही बात-व्यवहार करती है। कुछ देर विश्राम करनेके पश्चात् वे आगे बढ़े तो शीलवतीका ननिहाल आया। उस गाँवमें प्रवेश करते ही बीच रास्तेमें शीलवतीका मामा मिल गया। वह शीलवतीको देखकर बहुत प्रसन्न हुआ और दोनोंको आदरपूर्वक अपने घर ले गया। वहाँ भोजन करनेके पश्चात् शीलवतीका ससुर अपने रथमें ही लेट गया। ससुरको रथमें लेटा देखकर शीलवती भी घरके अन्दर नहीं गयी, अपितु रथकी छायामें ही बैठ गयी। इसी समय घरके बगलमें उगे की कथा *

बबूल के पेड़पर बैठकर एक कौवा काँव-काँव करने लगा। लगातार काँव-काँवकी आवाज सुनकर शीलवती कहने लगी- ‘अरे! तू थकता क्यों नहीं? एक बार पशुकी बोली सुनकर कार्य करनेसे तो मुझे घरसे निकाला जा रहा है। अब तुम्हारी बोलीके अर्थके अनुसार कार्य करके एक नयी आफत मोल लूँ? कल आधी रातके समय गीदड़की आवाज सुनकर मैं नदीके किनारे गयी और वहाँ जलमें उतराये मुर्देके शरीरसे बहुमूल्य आभूषण उतारकर घर ले आयी। उसके दण्डस्वरूप मेरे ससुर मुझे घरसे निकाल रहे हैं। अरे कौवे ! अब तू कह रहा है कि इस बबूलके पेड़की जड़के पास बहुत सारा सोना गड़ा हुआ है। तो क्या इसे निकालकर फिर एक नयी विपत्ति मोल लूँ?’
शीलवतीका ससुर इस बातको सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ और जाकर बबूलकी जड़के पास खोदकर सारा सोना ले आया तथा बहूकी बड़ाई करने लगा। वह उसे रथमें बैठाकर वापस घरकी ओर ले चला। मार्गमें उसने बहूसे पूछा कि तुम बरगद की छायामें क्यों नहीं बैठी ? शीलवतीने उत्तर दिया कि ‘वृक्षकी जड़में सर्पका भय रहता है और ऊपरसे चिड़ियाँ भी बीट करती हैं। इसलिये दूर बैठना ही बुद्धिमानी है।’ फिर कुलपुत्रके बारेमें पूछने पर उसने बताया कि वास्तविक शूर वही होता है, जो कि पहले प्रहार करता है और वह प्रहार खाली नहीं जाता। इसी प्रकार उसने नगरके सम्बन्धमें बताया कि जिस नगरके लोग आगन्तुक अतिथियोंका स्वागत नहीं करते, उसे वस्तुतः नगर नहीं कहा जाता। नदी पार करनेके सम्बन्धमें उसने कहा ‘नदीमें विषैले जीव-जन्तुओंका भय होता है और पैदीमें कंकड़-पत्थर तथा काँटे होते हैं, जो नंगे पाँवमें चुभ सकते हैं। अतः जूते पहनकर पार करनेमें ही सुरक्षा है। इसीलिये मैंने जूते नहीं उतारे।’
शीलवतीको बुद्धिमत्तासे उसका ससुर बहुत प्रसन्न हुआ और उसमें उसे आदर्श गृहिणीके सभी गुण प्रकट दिखायी दिये। उसने शीलवतीकी प्रशंसा करते हुए उसे घरकी मालकिन बना दिया। [ जैनग्रन्थ]

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