घटना बंगाल प्रांत की है। वर्द्धमान जिले के एक विद्यालय में, एक बालक दसवीं कक्षा में पढ़ता था। वह पढ़ने में कुशाग्र बुद्धि का था, साथ ही वह साहसी,निर्भीक, एवं सेवा भावी भी था। खेल कूद में भी रुचि लेता था।
जब परीक्षा के दिन निकट आ गए तो बालक ने खेलकूद में भाग लेना बंद कर दिया।
उसके साथियों को उसका अभाव अखरा।
एक दिन वे शाम को उस बालक के घर गए और पूछा- हमारा मित्र कहां है?
उसकी मां ने उत्तर दिया -वह तो तुम लोग के साथ ही खेल रहा होगा! वह यहाँ तो नहीं है। आजकल वह शाम को भी काफी देर से लौटता है।
इस पर एक छात्र ने कहा -माता जी! वह तो एक माह से हमारे साथ खेलने ही नहीं आ रहा है।
अच्छा! तो आज मैं उससे पूछूंगी कि वह शाम को कहां जाता है। मां ने उत्तर दिया।
सब लौट गए। शाम को काफी देर से अंधेरा होने पर बालक लौटा, तो माँ ने पूछा -बेटा!शाम को तू कहां जाता है? आजकल खेलने भी नहीं जाता है!
मां मैं दो बच्चों को पढ़ाने जाता हूं। बालक ने कहा।
माँ ने पूछा- क्या तुम्हारा जेब खर्च कम पड़ रहा है, जो तू लड़कों को ट्यूशन पढ़ाने जाता है? यदि ऐसी बात है, तो तुम्हारे पिताजी से कहकर मैं तुम्हारा जेब खर्च बढ़वा दूंगी।
माँ ऐसी बात नहीं है। मेरा एक मित्र बहुत निर्धन है। उसके पिता उसकी परीक्षा की फीस जमा नहीं करा सकते हैं, उसकी आर्थिक सहायता के लिए मैं ट्यूशन करता हूं। बालक ने कहा।
तब माँ ने कहा- यदि ऐसा ही है तो तू मेरे से और पैसे मांग लेता!
बालक ने उतर दिया- नहीं माँ मैं अपने परिश्रम से कमाए धन से ही मित्र की सहायता करना चाहता हूँ।
बालक की परिश्रम शीलता एवं परोपकार की भावना को देखकर माँ भी दंग रह गई।
यही बालक भविष्य में “नेताजी सुभाष चंद्र बोस” के नाम से विख्यात हुए, जिन्होंने आजाद हिंद फौज की स्थापना कर, देश के लिए अपनी आहुति दे दी ।














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