मीरा चरित भाग- 49

मैनें सुना है जब वह गाती है तब आँखों से आँसू बहने लगते हैं।जी चाहता है ऐसी प्रेम मूर्ति के दर्शन मैं भी कर पाता।’
‘यदि ऐसी भक्ति ही करनी थी तो फिर विवाह क्यों किया?’
‘सुना है मैनें मेड़ते में बीनणी के विवाह के लिए मना किया था पर जवाँई सा (वीरमदेवजी) नहीं माने।माता पिता से बेटी अधिक क्या कहती?’
‘तब यह तो भक्ति करेगी और राजकुमार? वे तो सेंत मेंत में बलि के बकरे बन गये।’
‘बलि के बकरे की क्या बात है इसमें? मेदपाट के युवराज चाहें तो एक क्या दस विवाह कर सकतें हैं।उन्हें पत्नियों की क्या कमी है? पर इस सुख में क्या धरा है? यदि कुमार में थोड़ी सी भी बुद्धि होगी तो वे बीनणी से शिक्षा लेगें।’

‘बीनणी से महाराज कुमार शिक्षा लेगें? यह क्या फरमा रहे हैं आप? शिक्षा देने वाला कोई और नहीं बचा इस दुनिया में? अच्छा जीवन बिगाड़ा बालक का।’
‘ क्या व्यर्थ की बात करती हो हाड़ी जी। शिक्षा लेने देने में स्त्री पुरुष कहाँ से आ गये? वह तो जहाँ से मिले वहीं से ले लेनी चाहिए।जीवन बिगड़ा या सुधरा, इसे तुम्हारी ओछी बुद्धि नहीं समझ पायेगी।अत: आज्ञा है कि उनकी इच्छा में दखल न दिया जाये।’
‘अच्छा हुक्म है ये, अब तक बहुएँ सास की आज्ञा में रहती थीं, ससुराल की कुल रीतियों का पालन करतीं थीं और अब सासुओं को बहू की इच्छानुसार चलना पड़ेगा।’
‘चुप भी रहो। बुद्धिहीनों को सब बात उल्टी ही सुनाई देती है।हुकुमत करने जितनी बुद्धि तो जुटा लो पहले।”
दीवान जी चिढ़ कर बाहर पधार गये।


‘सुना है आपने योग की शिक्षा भी ली है। ज्ञान और भक्ति दोनों ही आपके लिए सहज है। यदि थोड़ी-बहुत शिक्षा सेवक भी प्राप्त हो तो यह जीवन सफल हो जाये।’- मसनद के सहारे गद्दी पर विराजे भोजराज ने मीरा से कहा।
थोड़ी ही दूरी पर एक दूसरी गद्दी पर विराजित कुँवराणा सा मेतड़णी जी
गिरधरलाल के बागे में मोती टाँक रहीं थीं।
भोजराज की बात सुनकर मुस्करा कर उनकी ओर देखा- ‘यह क्या फरमाते हैं आप ? चाकर तो मैं हूँ। प्रभु ने कृपा की कि आप मिले। कोई दूसरा होता तो अब तक मीरा की चिता की राख भी नहीं रहती। चाकर आप और मैं, दोनों ही गिरधरलाल के हैं।’
‘भक्ति और योग में से कौन श्रेष्ठ है ? विशेषकर योग क्या है और कैसे किया जाता है? इसके लाभ क्या हैं?’ भोजराज ने पूछा।
‘भक्ति और ज्ञान की भाँति ही योग भी अध्यात्म का एक स्वतन्त्र मार्ग है, साथ ही इनका सहायक भी है।योग पहले शरीर को साधता है।शरीर के माध्यम से ही थकाकर मन को भी साध लेता है।योगासन से शरीर को स्वस्थ रखने का प्रयत्न होता है।प्राणायाम से मन साध लिया जाता है फिर धारणा- ध्यान। कुंडलिनी के जाग्रत होने पर उत्थान का प्रयत्न होता है और उसके ब्रह्मरंध्र के पहुँचने पर परमानंद की प्राप्ति।’

‘इस कुंडलिनी के विषय में भी सुना है मैनें।उसका उत्थान और परमानंद की प्राप्ति का अनुभव आपको हुआ।’ भोजराज ने पूछा।
‘मेरी कुंडलिनी भृकुटि मध्य तक ही पहुँच पाई।’ मीरा हँस पड़ी।
‘कोई अड़चन विक्षेप हुआ’
‘नहीं, यद्यपि गुरूदेव ने बताया था कि अब थोड़े ही प्रयत्न से यह साध्य है किंतु मैनें प्रयत्न ही नहीं किया।’
‘कोई कारण’
‘उस परमानंद की प्राप्ति से अधिक रूचिकर मुझे अपने प्राण सखा की सेवा लगी’
‘क्या उससे अधिक आनन्ददायी है’
‘यह तो अपनी रुचि की बात है, अन्यथा सभी भक्त ही होते हैं संसार में।योगी ढूँढे भी न मिलते कहीं।आपके लिए योग कठिन है।उसके लिए समय देना पड़ता है।आप पर तो राज्य के बहुत उत्तरदायित्व हैं।’
‘एक बात निवेदन करूँ? पर इसके साथ ही साथ अपराध की क्षमा भी चाहता हूँ।’

मीरा उनकी बात सुनकर हँस दी- ‘यह तो न्यायाधीश की बात नहीं है।क्या बिना अपराध सुने ही आपके न्यायालय में क्षमा मिल जाती है अपराधी को।’
‘नहीं यह संभव नहीं किंतु अपराधी विवश हो तो?’
‘अर्थात् अपराध करने को विवश हो? तब भी न्यायाधीश आप हैं निर्णय आप ही करें।’
‘चार महीने हो गये’- भोजराज ने दृष्टि झुका ली- ‘पर……’
‘वह मुझे ज्ञात है’- मीरा ने बात काटकर मानों भोजराज को संकोच से उबार लिया, किंतु ‘ज्ञात है’ सुनकर उन्होने आश्चर्य से मीरा की ओर देखा।

‘मनुष्य का जोर शरीर पर ही चलता है।मन सबके बस में आ जाये यह सहज नहीं।मन जिसने बनाया है वही सम्हाँलेगा।केवल यही देखें कि शरीर मन के बस में न हो जाये।आप चिंता न करें, जिसने श्यामकुँज में आपको वचन देने की प्रेरणा दी, वही उस वचन की रक्षा भी करेगा’- मीरा ने बात पूरी करते हुए कहा- ‘एक बात मुझे भी अर्ज करना है आपको।’
‘एक क्यों, दस फरमायें।ये प्यासे कान तो सदा उन्मुख रहते हैं’- भोजराज बोले।
“आप जगत-व्यवहार और वंश चलाने के लिए दूसरा विवाह कर लीजिए।” “बात तो सच है आपकी, किन्तु सभी लोग सब काम नहीं कर सकते।’
‘इच्छा और शक्ति हो तो अवश्य कर सकते हैं’
‘उस दिन श्याम कुँज में ही इच्छा इन चरणों की चेरी बन गई थी और शक्ति सदा इच्छा की अनुगामिनी रही है। इन बातों में क्या रखा है? यदि इनमें थोड़ा भी दम होता तो .. “- बात अधूरी छोड़ कर वे मीरा की ओर देख मुस्कुराये- “रूप और यौवन का यह कल्पवृक्ष चित्तौड़ के राजकुवंर को छोड़कर पीतल की इस मूर्ति पर न्यौछावर नहीं होता और भोज शक्ति और इच्छा का दमन कर इन चरणों का चाकर बनने में अपना गौरव नहीं मानता। जाने दीजिये इन बातों को।आप तो मेरे कल्याण की सोचिए। लोग कहते हैं – ईश्वर निर्गुण निराकार है। इन स्थूल आँखों से नहीं देखा जा सकता, मात्र अनुभव किया जा सकता है। सच क्या है, समझ नहीं पाया।इस उलझन को सुलझाने के लिए बहुत साधु संतों के पास रोता फिरा हूँ, पर मन को बाँधे ऐसा समाधान कहीं नहीं मिला।’

‘वह निर्गुण निराकार भी है और सगुण साकार भी” – मीरा ने गम्भीर स्वर में कहा -“निराकार चेतन रूप में वह सृष्टि में व्याप्त है। इसके अतिरिक्त कहीं कुछ भी नहीं है।जैसे वस्त्र में सूत है और जैसे लहरों में पानी है, वैसे ही उसके बिना जगत की कोई सत्ता नहीं है।इन बातों को सुनकर विश्वास करना पड़ता है।
क्रमशः

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