मीरा चरित भाग- 8

यदि वे मुझे जलती हुई अग्निमें कूद पड़नेको कहें तो क्या मैं यह आगा-पीछा सोचूँगा कि मेरे पीछे मेरी पत्नी और पुत्रीका क्या होगा? नहीं, यह असम्भव है। मेरे लिये तो मेरे पीछे दाता हुकम हैं, यह आश्वासन ही बहुत है और मैं इसीके सहारे आगमें कूद जाऊँगा। पूरा परिवार उन्हींके लिये और उन्हींकी सुख-सुविधा और प्रसन्नताके लिये है। हमारे चारभुजानाथ तो दाता हुकम ही हैं। तुम मनसे सारी दुविधाएँ निकाल दो।’- रतनसिंहजीने पत्नी के आँसू पोंछ उसे पलंग पर बिठाते हुए कहा- ‘तुम यह क्यों नहीं देखती कि दाता हुकम भले उसकी शिक्षाके हजार प्रबन्ध करें, यदि मीराकी रुचि न होती तो क्या वह कुछ सीखती? स्थिति यह है कि उसकी प्रगतिसे उसके गुरु बहुत संतुष्ट हैं। वह क्यों नहीं अन्य बच्चोंके साथ खेलती? क्यों नहीं दूसरी लड़कियोंकी भाँति स्त्रियोंके झुंडमें बैठकर उनकी शृंगारिक बातें सुनती? क्यों वह अपने रहन सहनकी ओरसे उदासीन है? इसीलिये कि वह उन सबसे भिन्न है। दाता हुकम नासमझ नहीं हैं कि उसकी शिक्षाका ऐसा उल्टा प्रबन्ध करें। बड़े दादोसा (बड़े भाई) और बिचले दादोसाकी बेटियाँ नहीं हैं क्या? उन्हें तो दाता हुकम नहीं फरमाते संगीत और योग सीखनेके लिये, फिर इसे ही क्यों? मनमें निश्चय कर लो कि यही इसके लिये आवश्यक है।’

उन्होंने पत्नीकी पीठपर हाथ रखा, दूसरे हाथसे उनका मुँह अपनी ओर फेरते हुए बोले– ‘सुनो एक बात बताऊँ तुम्हें! एक बार अजमेरमें एक ज्योतिषि ने मेरी जन्म-पत्रिका देखकर कहा था कि आपकी कुंडलीके पाँचवें घरमें चन्द्रमा जिस स्थितिमें है, उसे देखते हुए आपको केवल एक कन्या-संतान प्राप्त होगी। वह कन्या आपको ही नहीं, पूरे वंशको यशोज्ज्वल कर देगी।’

‘यह बात पहले क्यों नहीं बतायी आपने? “

‘बेटी ही नहीं हुई थी तो कहता क्या? इसके होने पर बहुतसे दिन तो परिवार के हर्षोल्लास ने ही खींच लिये। हम दोनों तो जैसे चोरी करते पकड़े गये हों, ऐसे सहमे-सकुचाये-से सारी हँसी-खुशीसे दूर-दूर रहनेका प्रयत्न करते। बाप रे! कैसा कठिन समय था वह, है न!’
रतनसिंह हँस पड़े- “सारे उत्सवके केन्द्र होते हुए भी उससे दूर रहना, मनमें खुशी होते हुए भी बाहर प्रकट न होने देना बहुत कठिन काम है। चलो, हम तो निपट गये। अब तो बड़े दादोसा (वीरमदेवजी) और भाभीसाकी बारी है। देखना, भँवरका जन्म होनेपर कैसे तंग करता हूँ मैं ।मीराके जन्मोत्सवके दिनोंमें जैसे ही मैं सामने पड़ता, दादोसा मेरी ओर देखकर मुस्करा देते। मैं घबरा जाता कि कहीं कोई देख न ले, नजरें झुका लेता या मुँह दूसरी ओर फेर लेता। बादमें तो मैंने निश्चय ही कर लिया कि उनकी ओर देखना ही नहीं, किंतु वे पुकार लेते भाया कहकर और आँखें अनायास उठ जातीं। उनकी देखा-देखी दोनों दादोसा भी यही करने लगे तो जी चाहता था कि मेड़ता छोड़कर कुछ दिनके लिये कहीं बाहर चला जाऊ, किंतु जानता था कि इसके लिये तो दाता हुकमसे आज्ञा ही न मिलेगी। हे भगवान् ! जैसे एक तूफानसे गुजरे हों। तुम स्त्रियों को बड़ा आराम है। कम-से-कम ससुरालमें ऐसी लज्जासे थोड़ी बहुत छुट्टी है। पीहरमें तो रहना ही कितना होता है? हमें तो दोनों ओरसे मुसीबत है। कब तक होगा भाभीसाके बालकका जन्म?”

‘अब अधिक समय नहीं हैं, महीना-पन्द्रह दिन और’
वीर कुँवरीजीने कहा।

‘देखना, मैं कल ही दादोसासे अग्रिम बधाई माँगूँगा और भँवर (दादाके जीवनकालमें ही पौत्रका जन्म हो जानेपर बालकका नाम चाहे जो हो, गुरुजन उसे भँवर, भँवर लाल कहते हैं और दूसरे लोग भँवर बना, भँवर बावजी कहते हैं) के जन्मके पश्चात् तो सीधे-सीधे, दाता हुकमके पास बिराजे होंगे, उसी समय बधाई देकर साफे का पल्ला फैला दूँगा और छोटी-मोटी वस्तुसे कभी संतुष्ट नहीं होनेवाला मैं, बहुत कुढ़ाया है मुझे। सारा बैर चुका लूँगा।’— रतनसिंहने हर्षमग्न होते हुए कहा।

“अहा, ऐसा भी कोई करता है? पिताके सम्मुख पुत्रकी बधाई स्वीकार करना। यदि आपने ऐसा किया और बावजी हुकमने (युवराज) आपके कंधेको पकड़कर अन्नदाता हुकमकी ओर घुमा दिया तो फिर बेवकूफ बन जायेंगे न आप ! तब क्या करेंगे, बताइये जरा?”- वीर कुँवरीजीने हँसते हुए पूछा ।

‘हाँ, यह तो मैंने सोचा ही नहीं! ऐसा करूँगा कि जब महफिल होगी, तब मैं इस प्रकार साफेका पल्ला फैलाऊँगा कि मानो दाता हुकमकी नजर बचाकर ऐसा कर रहा हूँ, किन्तु वास्तवमें दाता हुकम भी देख लें और दादोसा हुकम भी।’

‘वह तो भँवर बना जब सवा महीनेके हो जायँगे, तब होगा न ! उस समय भी यदि बावजी हुकमने आँखें फेर ली तो क्या पल्ला फैलाये बैठे ही रहेंगे? भँवर बना पर नजर न्यौछावर कुछ नहीं करेंगे? जाने भी दीजिये न ! वे बड़े हैं। उन्होंने आपको चिढ़ाया- कुढ़ाया तो आवश्यक तो नहीं कि बदला लिया ही जाय? अकेलेमें माँग लीजियेगा, जो चाहें। मैं भी सुनूँ क्या माँगेंगे; जागीर, हाथी, घोड़ा, सोना?”

“अरे नहीं! इन वस्तुओंकी क्या गिनती उस खुशीमें। क्या माँगू; तुम्हीं कुछ बताओ न?”

‘अब मैं क्या बताऊँ? यदि भगवान से माँगना होता तो नवजात बालकके लिये उसका भँवर पद (पौत्र पद) की अखण्डता माँगते। बावजी हुकमसे माँगने जैसा तो कुछ नही सूझ रहा है.!!’

“ठहरो, मुझे एक बात सूझ रही है। देखो, छोटे दादोसा (रायमल) और छोटा भाई जोधपुर चले गये। अब जोधपुरसे युद्ध अनिवार्य-सा हो गया है। युद्धमें कभी भाई आमने-सामने हुए तो…? टाल जाना हरामखोरी और लड़ना…? मनपें अथाह स्नेह लिये खंगसे एक दूसरेका खून बहाना…. कैसा कठिन कार्य है, है न!”

‘ठीक फरमाते हैं आप, किंतु हुकम! यही तो क्षत्रियके धैर्य और धर्मकी कसौटी हैं। हमारा धर्म ही ऐसा कठिन है कि इसमें बाप-बेटे, भाई-भाई कुछ नहीं होते। कर्तव्य, धर्म, स्वामीभक्ति ही क्षत्रियके सगे सम्बन्धी हैं। रणसे पूर्व वे मिलते हैं और रणमें उनकी तलवारें मिलती हैं। होठों पर हँसी लिये एक दूसरे के वारों-पैतरोंकी प्रशंसा करते हुए वे भूखे नाहर (शेर) से एक दूसरेपर टूट पड़ते हैं। आप राठौड़ों की तो बात ही क्या कही जाय। माथा कटकर गिर पड़े, फिर भी आप लोगों की तलवार नहीं रुकती। ऐसा रणरंग चढ़ता है कि सिरविहीन धड़ न गिरता है, न पीछे हटता है। इसी से तो आपको कमधज (कबन्ध’ रामायण का एक किरदार) का विरद प्राप्त है। हाँ, आप अपने बड़े भाईसे कुछ माँगना चाहते थे न?”
क्रमशः

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