
संतों को परम् हंस
हरि ॐ तत्सत संतों को परम् हंस माना गया है।क्योंकिये अपने शरीर को तपाकर इस संसार रूपी भवसागर को मथकर

हरि ॐ तत्सत संतों को परम् हंस माना गया है।क्योंकिये अपने शरीर को तपाकर इस संसार रूपी भवसागर को मथकर

एक साधु को एक नाविक रोज इस पार से उस पार ले जाता था, बदले मैं कुछ नहीं लेता था,

इस कथा में गृहस्थ जीवन में अध्यात्मवाद को दर्शाता है। घर में कठोर मेहनत प्रेम का प्रतीक है। जिस घर

विज्ञान की जड़े हिला दी थी, इस संत ने.. “प्रह्लाद जानी” वो इंसान जिसने 76 सालो से जीवन मे कुछ

चरणों में काँटे लिए, लेकिन एक दिन क्या हुआ कि भगवान कह रहे थे — आ हा हा, कैकेई माता

प्रभु प्रेम हे परम पिता परमात्मा जी मै तुमको प्रणाम करता हूँ हे मेरे भगवान् नाथ हे दीनदयाल हे मेरे

साधना में लगन मोक्ष की प्राप्ति का साधन है। हम क्या करते हैं थोड़ी सी पुजा पाठ करते ही अपने

तूँ तूँ करता तूँ भया,मुझ मैं रही न हूँ। वारी फेरी बलि गईजित देखौं तित तूँजीवात्मा कह रही है कि

प्रेम की आकांक्षा ही तो तुम्हारी आत्मा है| तुम कितने ही जंगलो में चले जाओ, कितनी ही दूर, और कितनी

हम समय की कीमत को भुलते जा रहे हैं।आज का व्यक्ती समय की महत्ता को भुल गया है। समय को