भगवान (Bhagvan)

29हनुमान जी की आत्मकथा

अनुज समेत गहेहु प्रभु चरनादीन बन्धु प्रणता रति हरना ।(रामचरितमानस) भरत भैया ! मैं महाराज सुग्रीव जामवन्त युवराज अंगद के

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[28]हनुमानजी की आत्मकथा

एक सम्वाददाता, मैं और श्रीहनुमान जी नाम पहारू दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट…(रामचरितमानस) साधकों ! कल चुनाव था… इतनी जिम्मेवारी

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[26]हनुमानजी की आत्मकथा

तत्तेनुकम्पाम् सुसमीक्षमाणो…(श्रीमद्भागवत) दुःख बहुत है मेरे जीवन में क्या करूँ ? एक दुःख जाता है… जैसे-तैसे… फिर दूसरा दुःख मुँह

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गोपी-कृष्ण

एक बार की बात है, पांच सखियाँ थीं, पांचो श्री कृष्ण की अनन्य भक्त थीं. एक दिन वे वन में

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[25]हनुमान जी की आत्मकथा

आज के विचार ( अयोध्या का लक्ष्मण किला ) रघुपति कीरति विमल पताका…(रामचरितमानस) अवध के लक्ष्मण किला में आप कभी

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[24]हनुमान जी की आत्मकथा

( भक्ति दर्शन का एक विलक्षण दृष्टिकोण ) भक्त्या तुष्यति केवलम्…(पद्यावली) चक्रवर्ती सम्राट दशरथ जी के यहाँ पुत्र हुए… एक

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[23]हनुमानजी की आत्मकथा

आज के विचार ( हे मेरे प्यारे राम..)भाग-23 राम समान प्रभु नाहीं कहूँ…(रामचरितमानस) मेरे प्यारे राम ! ये क्या लीला

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