
[55]”श्रीचैतन्य–चरितावली”
।। श्रीहरि:।। [भज] निताई-गौर राधेश्याम [जप] हरेकृष्ण हरेरामभक्त हरिदास अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान्यज्जिह्वाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम्।तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुरार्याब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये

।। श्रीहरि:।। [भज] निताई-गौर राधेश्याम [जप] हरेकृष्ण हरेरामभक्त हरिदास अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान्यज्जिह्वाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम्।तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुरार्याब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये

।। श्रीहरि:।। [भज] निताई-गौर राधेश्याम [जप] हरेकृष्ण हरेरामद्विविध-भाव भगवद्भावेन यः शश्वद्भक्तभावेन चैव तत्।भक्तानानन्दयते नित्यं तं चैतन्यं नमाम्यहम्।। प्रत्येक प्राणी की

।। श्रीहरि:।। [भज] निताई-गौर राधेश्याम [जप] हरेकृष्ण हरेरामव्यासपूजा ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।। प्रेम का

।। श्रीहरि:।। [भज] निताई-गौर राधेश्याम [जप] हरेकृष्ण हरेरामअद्वैताचार्य के ऊपर कृपा सखि साहजिकं प्रेम दूरादपि विराजते। चकोरीनयनद्वनद्वमानन्दयति चन्द्रमाः।। यदि प्रेम

श्रीवामनपुराण के माध्यम से अध्यात्मिक प्रसंगमहिषासुर वंश कथा भाग – 1 ऋषी पुलस्त्यजी से नारदजी ने पूछा —-ऋषे ! द्विजोतम

।। श्रीहरि:।। [भज] निताई-गौर राधेश्याम [जप] हरेकृष्ण हरेरामस्नेहाकर्षण दर्शने स्पर्शने वापि श्रवणे भाषणेऽपि वा।यत्र द्रवत्यन्तरंगं स स्नेह इति कथ्यते।। सचमुच

गृहस्थ जीवन का सबसे बड़ा दुर्भाग्य- अंतहि तोहिं तजेंगे पामर, तूँ न तजे अबहीं ते गृहस्थ जीवन में रहते हुए

।। श्रीहरि:।। [भज] निताई-गौर राधेश्याम [जप] हरेकृष्ण हरेरामश्रीनृसिंहावेश किं किं सिंहस्ततः किं नरसदृशवपुर्देव चित्रं गृहीतोनैतादृक् क्वापि जीवोऽद्भुतमुपनय मे देव संप्राप्त

।। श्रीहरि:।। [भज] निताई-गौर राधेश्याम [जप] हरेकृष्ण हरेरामश्रीवाराहावेश नमस्तस्मै वराहाय हेलयोद्धरते महीम्।खुरमध्यगतो यस्य मेरु: खुरखुरायते।। ‘आवेश’ उसे कहते हैं कि

।। श्रीहरि:।। [भज] निताई-गौर राधेश्याम [जप] हरेकृष्ण हरेरामनिमाई के भाई निताई पुण्यतीर्थे कृतं येन तपः क्वाप्यतिदुष्करम्।तस्य पुत्रो भवेद्वश्यः समृद्धो धार्मिकः