
बांसुरी सुनूंगी, मैं तो बांसुरी सुनूंगी
बांसुरी सुनूंगी मीरा बाई का भक्ति रस से परिपूर्ण पद भावार्थ और व्याख्या:यह पद भक्त शिरोमणि मीरा बाई की अटूट
बांसुरी सुनूंगी मीरा बाई का भक्ति रस से परिपूर्ण पद भावार्थ और व्याख्या:यह पद भक्त शिरोमणि मीरा बाई की अटूट
1 चलो चले मन वृंदावन की परिक्रमा करी आवे।द्वादश वन हैं इनके अंदर कृपा सबहि की पावे।।2 शुरू करें गुरु
श्रीकृष्ण के लीला काल का समय था, गोकुल में एक मोर रहता था, वह मोर श्रीकृष्ण का भक्त था, वह
अरे मैं वृंदावन को जाऊं मेरे श्याम खेल रहे होली,मेरे श्याम खेल रहे होली, घनश्याम खेल रहे होली,अरे मैं वृंदावन
केसर रंग से भरी पिचकारी लाई, पिचकारी लाईमैं तो सांवरे के संग होरी खेलन आई…..राधा रानी संग विशाखा, सखियां सारी
सखी मैं कैसे होली खेलू री सांवरिया के संग,सांवरिया के संग सखी सांवरिया के संग…… कोरे कोरे कलश मँगाए उनमे
होली खेल रहे नंदलाल , वृन्दावन की कुंज गलीन में,मथुरा की कुंज गलिन में गोकुल की कुंज गलीन में,होली खेल रहे
इस होली में ओ मेरे कान्हा,जरा बच–बच के रहियो,सब भर पिचकारी लायेंगे,तुम देखते रहियो,सब भर पिचकारी लायेंगे,तुम देखते रहियो,इस होली
मुरलीधर, गोपाल, कन्हैया,मत छेड़ो नंदलाल, कन्हैया। मैं गोरी सी एक गुजरिया,कब से बैठी, आय अटरिया,इत उत खोजें, बेसुध नैना,जित देखूँ
कन्हैया तोपे रंग डारेगो सखी घूँघट काहे खोले।। भरी पिचकारी तोरे माथे पे मारेमाथे पे मारे हांजी माथे पे मारेसखी