
गोविन्द चले आओ गोपाल चले आओ
गोविन्द चले आओ, गोपाल चले आओ हे मुरलीधर मोहन मेरे श्याम चले आओ मेरी नाव भावर में है, और दूर

गोविन्द चले आओ, गोपाल चले आओ हे मुरलीधर मोहन मेरे श्याम चले आओ मेरी नाव भावर में है, और दूर

॥ गोपीगीतम् ॥ गोप्य ऊचुः । जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि । दयित दृश्यतां दिक्षु

कितना प्यारा है तू बांके बिहारी तेरे जैसा दूसरा नहीं, लत है घुंगर वाली अख कजरारी,रे जैसा दूसरा नहीं कितना

इन अंखियो का सवरा नजारा नजरे यो श्याम से मिली ये याहा सारा लगता हमारा नजरे यो श्याम से मिली

आज कृष्ण का हुआ अवतार के झूम उठा सारा संसार चंदा सा मुखड़ा रंग श्याम सलोना सोने के पलने में

आगे पीछे घूम रहा क्यों बात बता दे ओ कान्हा टुकर टुकर मुझे देख रहा क्यों साफ बता दे ओ

आयो होली आयो होली रे गोपियाँ सब झूम रही है यमुना के तट घूम रही है नीला पीला जग हुआ

दहि बेचन को राधा चली, कन्हैया जी को अच्छी लगी, गोरे गोरे मुख पर लाल-लाल बिंदिया, ऊपर से माँग भरी, कन्हैया जी को अच्छी

तेरी खट्टी मीठी इश्क है श्याम, राधा न आये तेरी गलियां, तेरी गलियां श्याम तेरी गलियां, तेरे सिवा दूजा लव

जरा गेर गड्डी नु लादे मैनु कटरा शहर पुंचादे, भाई बस्सा वालिया मैं माँ दे मंदर जाना माँ ने आप