
श्री भगवद अवतार चौबीसी
सनक सनंदन सनातन, चौथे सनत्कुमार। ब्रह्मचर्य धारण किया, हुआ प्रथम अवतार ।। वाराहरूप धरके प्रभु, हिरण्याक्ष को मार। पृथ्वी लाये
सनक सनंदन सनातन, चौथे सनत्कुमार। ब्रह्मचर्य धारण किया, हुआ प्रथम अवतार ।। वाराहरूप धरके प्रभु, हिरण्याक्ष को मार। पृथ्वी लाये
इतना तो करना स्वामी, जब प्राण तन से निकले। गोविन्द नाम लेकर मेरे प्राण तन से निकले। श्री गंगा जी
गुरुअवतरण दिवस पर देखो, महक उठा संसार।गुरुवर वंदन करतें जाना, दूर हटे अँधकार।। भगवत भगवन मंत्र बताए, करना प्रतिदिन जाप।जीवात्मा
मुंशी प्रेमचंद जी की एक सुंदर कविता, जिसके एक-एक शब्द को बार-बार पढ़ने को मन करता है- ख्वाहिश नहीं मुझेमशहूर
जपने वाले को ही मिलता भगवान हैं नाम जप का सुखद होता परिणाम है नाम जपना नहीं इतना आसान हैगुरु
हटे वह सामनेसे, तब कहीं मैं अन्य कुछ देखूँ।सदा रहता बसा मनमें तो कैसे अन्यको लेखूँ ? उसीसे बोलनेसे ही
है आँख वो जो श्याम का दर्शन किया करे,है शीश जो प्रभु चरण में वंदन किया करे। बेकार वो मुख
बरसाना मिल गया है,मुझे और क्या कमी है,श्री जी भी तो मिलेगी,मुझको तो ये यकीं है,बरसाना मिल गया हैं,मुझे और
हे प्रेमरस से युक्त किशोरी जी! हे किशोर अवस्था वाली राधिके! हे प्रेमरस में सराबोर वृषभानुदुलारी! मेरे ऊपर भी कृपा
पिया तोड़ दो बंधन आज की अब रूह मिलना चाहती हैपिया तोड़ दो बंधन आज,की अब रूह मिलना चाहती है,पिया