
मुनि अगस्त्यजी के शिष्य सुतीक्ष्ण
।। जय श्रीराम ।। मुनि अगस्ति कर सिष्य सुजाना।नाम सुतीछन रति भगवाना।। मन क्रम बचन राम पद सेवक।सपनेहुँ आन भरोस

।। जय श्रीराम ।। मुनि अगस्ति कर सिष्य सुजाना।नाम सुतीछन रति भगवाना।। मन क्रम बचन राम पद सेवक।सपनेहुँ आन भरोस

रामचरितमानस के अरण्य कांड में ऋषि शरभंग की कथा बहुत ही मर्मस्पर्शी और भक्ति से भरी हुई है। यह कहानी

।। जय भगवान श्री गणेश जी ।। हिमालय की निस्तब्धता के बीच एक ऋषि के मन में ऐसा तूफ़ान उठ

एक ग़रीब आदमी था। एक दिन वह राजा के पास गया और बोला- ‘महाराज, मैं आपसे कर्ज़ मांगने आया हूं।

राजा ने बोए जौ , चने और माली ने बोई दूब। राजा के जौ , चने बढ़ते जा रहे थे

।। विश्वरूप दर्शन योग ।। अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्रा: सर्वे सहैवावनिपालसङ्घै:।भीष्मो द्रोण: सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यै:।। वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति

एक कथा के अनुसार, उज्जैन में एक राजा थे महाराजा गंधर्वसेन थे और उनकी दो पत्नियां थीं। एक पत्नी से

(हिन्दी अर्थ सहित) ॐत्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्।। जो व्यक्ति “ॐ” का उच्चारण करते हुए और

बुद्ध के पास एक राजकुमार दीक्षित हो गया,दीक्षा के दूसरे ही दिन किसी श्राविका के घर उसे भिक्षा लेने बुद्ध

पुष्प वाटिका का वह दिव्य क्षण जब पहली बार मिलीं राम और जानकी की दृष्टियाँ हरि अनंत, हरि कथा अनंतारामकथा