
सबसे दुबली आशा
तुलसी अद्भुत देवता आसा देवी नाम। सेये सोक समर्पई बिमुख भये अभिराम ॥ एक बार युधिष्ठिरने भीष्मजीसे पूछा कि ‘पितामह!

तुलसी अद्भुत देवता आसा देवी नाम। सेये सोक समर्पई बिमुख भये अभिराम ॥ एक बार युधिष्ठिरने भीष्मजीसे पूछा कि ‘पितामह!

जापानके सामन्तराज सातोमी बड़ी कठिनाईमें पड़ गये थे। शत्रु-सेनाने उनके दुर्गको तीन महीनेसे घेर रखा था। यह ठीक था कि

महर्षि आयोदधौम्यके दूसरे शिष्य थे उपमन्यु । गुरुने उन्हें गायें चराने और उनकी रखवाली करनेका काम दे रखा था। ब्रह्मचर्याश्रमका

एक भजनानन्दी साधु घूमते हुए आये और एक मन्दिरमें ठहर गये। मन्दिरके पुजारीने उनसे कहा *आप यहाँ जितने भी दिन

मर्यादापुरुषोत्तम विश्वसम्राट् श्रराघवेन्द्र अयोध्याके सिंहासनपर आसीन थे। सभी भाई चाहते थे कि प्रभुकी सेवाका कुछ अवसर उन्हें मिले; किंतु हनुमानजी

महात्मा हरिराम व्यासजी घर छोड़कर संवत् 1612 में ओरछासे वृन्दावन चले आये थे। उस समय इनकी अवस्था 45 वर्षकी थी।

संस्कार-सुरभित प्रेरक-प्रसंग प्रसन्नताका नुसख़ा एक संत किसी टीलेपर बैठे सूर्यास्त देख रहे थे। तभी एक सेठजी उनके पास आये। वे

किसी नरेशने मन्त्रीसे चार वस्तुएँ माँगीं-1- है | और है, 2- है और नहीं है, 3- नहीं है पर है,

कहते हैं कि सम्राट् अशोक से पहलेकी यह बात है – एक अत्यन्त दयालु तथा न्यायी राजा था। उसके राज्यमें

एक महात्मा थे। वे एकान्तमें देवीजीकी पूजा करते थे। एक दिन जब वे पूजा कर रहे थे उनके मनमें आया