
प्रभु-प्राप्तिका मार्ग
प्रभु-प्राप्तिका मार्ग द्वितीय सिक्खगुरु अंगददेवजीका पूर्वनाम लहिणा था। तीर्थयात्रा करते समय एक बार उनकी मुलाकात आदिगुरु नानकदेवसे हुई और उनके

प्रभु-प्राप्तिका मार्ग द्वितीय सिक्खगुरु अंगददेवजीका पूर्वनाम लहिणा था। तीर्थयात्रा करते समय एक बार उनकी मुलाकात आदिगुरु नानकदेवसे हुई और उनके

उसके केश और वस्त्र भीगे हुए थे। मुखपर बड़ी उदासी और मनमें अत्यन्त खिलता थी। उसके में जिज्ञासाका चित्र था

भक्तशिरोमणि कविवर रामप्रसाद सेनने अपने जीवनकालमें ही देवी उमाका साक्षात्कार किया था। इतनी थी उनकी प्रगाढ भक्ति एवं भगवतीके चरणोंकी

सद्गुरु बच्चा अगर तुम शिष्य बननेको तैयार हुए, तो सारा संसार तुम्हें सद्गुरुओंसे भरा हुआ दिखायी पड़ेगा। वृक्ष, चट्टानें और

एक व्याधने पक्षियोंको फँसानेके लिये अपना जाल बिछाया ! उसके जालमें दो पक्षी फँसे; किंतु उन पक्षियोंने झटपट परस्पर सलाह

महर्षि याज्ञवल्क्य नियमितरूपसे प्रतिदिन उपनिषदोंका उपदेश करते थे। आश्रमके दूसरे विरक्त शिष्य तथा मुनिगण तो श्रोता थे ही, महाराज जनक

एक श्रेष्ठ नारी थी। माता-पिता भगवद्भक्त थे, उन्होंने पुत्रीको उत्तम शिक्षा दी थी। विवाह हो जानेपर पतिगृह आकर उसने सोचा-

[3] नैतिक सामाजिकता एक फटे हाल महिला घायल अवस्थामें सड़कके किनारे पड़ी हुई कराह रही थी। पासमें उसका अबोध शिशु

रहीम खानखाना अपने समयके उदार और दानीदे व्यक्तियोंमेंसे एक थे। वे बहुत बड़े गुणग्राहक और भगवद्भक्त थे। उन्होंने अपने जीवनकालमें

अहन्ताके त्यागसे ही जीवन्मुक्ति एक राजा था, वह अत्यन्त विचारशील था। एक बार वह विचार करते-करते व्याकुल हो उठा, उसे