मां की अलमारी

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मां सालों से अपनी वही लोहे की अलमारी में ही सामान रखा करती थी जो नानी ने उनको शादी में दी थी। हालांकि अब नए बने घर में वार्डरोब थी लेकिन मम्मी को पसंद थी वही अपनी पुरानी लोहे की अलमारी । याद है मुझे की मां जब भी अपनी वो लोहे की अलमारी खोलती, हम सब भाई बहन आड़े टेढ़े होकर उनकी अलमारी में झांकने की कोशिश करते थे ।

एक अलग सी खुशबु आती थी उससे ,सौंधी सौंधी । मेरे लिए तो वो उनकी अलमारी एक खजाने की तरह होती , खोलते ही कहीं इधर हाथ डालती मैं कहीं उधर । , मम्मा अक्सर गुस्सा करती , ‘ कीमती काग़ज है इसमे कुछ इधर उधर गिर गए तो ‘। उनकी उस अलमारी में कपड़े कम और यादों का भरपूर खजाना ज्यादा होता । नानी के हाथ की बनी वो गुड़िया , दादी का शॉल जो वो अक्सर ओढ़ा करती थी , पापा की पहली गिफ्ट वो फर वाला पर्स जो कश्मीर से लाए थे उनके लिए , हम तीनों भाई बहनो के शुरुआत से अब तक की मार्कशीट , स्कूल के ग्रुप फोटोग्राफ और ना जाने क्या क्या । सौ बार देख चुके थे हम पर फिर भी हर बार ऐसे झांकते जैसे पहली बार देख रहे हों ।

उस अलमारी के दरवाजे पर बनीं रेक में मम्मी हॉस्पिटल से मिले हम भाई बहनो की जन्म प्रमाण पत्र रखती थीं जिसमें हमारे हाथ पैर के निशान होते.. बड़ा मज़ा आता था देखने में , फिर उससे अपने हाथ पैर नापने में की देखो हम कितने छोटे थे वो उनकी शादी के कार्ड में सबके नाम पढने मे बड़ा अच्छा लगता था। माँ गुस्से में छीन कर रख लेती थी वापिस , की सब फाड़ दोगे तुम लोग , कोई काम नहीं करने देते मुझे । पूरा घर नया renovate हुआ मेरी शादी से पहले पर मम्मा की वो अलमारी उनके बेडरूम में ही रही । पापा कई बार बोले कि जाती नहीं ये सारे interior के साथ, इससे स्टोर में रख देते हैं । पर वो नहीं मानी ।
आज वो अलमारी पीछे स्टोर में ही है, पर अब माँ नहीं गुस्सा होने के लिए। आज भी हम जब मायके जाते वो अलमारी एक बार जरूर खोलते पर जाने वो महक अब क्यूँ नहीं आती , वो उल्लास उनकी चीजें देखने का क्यूँ नही होता अब । शायद अब हाथों से वापिस छीन कर रखने के लिए वो जो नहीं है..अलमारी में अभी भी सब वैसे ही रखा है , वो करीने से प्रेस करके रखे हुए रुमाल की पंक्तियाँ , वो नानी की गुड़िया , वो दादी का शॉल , हमारी मार्कशीट ..पर अब अलमारी खोल निहार उसे हम फिर बंद कर देते । कहीं उनके कुछ कीमती कागज गिर गए तो गुस्सा होंगी ना वो फिर ।

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