*प्रभु संकीर्तन 31*

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याद रखो – तुम जो भक्ति, प्रेम और ज्ञान की बातें करते हो, इनका भी कोई मूल्य नही है, यदि तुम्हारे हृदय में भक्ति की पवित्र प्रभुपरायणता, प्रेम की मधुर और निष्काम सरसता एवं ज्ञान की दिव्य ज्योति नही है। मन से भक्त बनो, प्रेम का मन में ही अनुभव करो और ज्ञान के प्रकाश को अन्दर ही प्रदीप्त करो, तभी उनका असली लाभ मिलेगा।

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