मोह भवबन्धन , प्रेम मुक्त अभिव्यक्ति

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मोह बाह्य आडम्बर है, किंतु प्रेमको आन्तरिक अनुभूति कहा जाता है । मोहका सांसारिक पदार्थोंसे घनिष्ठ सम्बन्ध होता है, जबकि प्रेम अलौकिक समर्पणका द्योतक है । मोह एकांगी, मगर प्रेम उभय पक्षीय है । मोहमें ‘मैं’ की प्रधानता पायी जाति है, परंतु प्रेममें परमात्माका वास होता है । प्रेम साधन और साध्य दोनों है, लेकिन मोहमें यह गुण नहीं पाया जाता । मोह अधोगामी होता है तो प्रेम उत्कर्षकी राह है । वस्तुतः मोह भवबन्धन है, मगर प्रेम मुक्त अभिव्यक्ति है । मोह दुःखरूप है, प्रेम आनन्दस्वरूप है । मोहके व्यापारी अनेक हैं, परंतु प्रेमके पुजारी विरले ही होते हैं । मोहका अन्त मृत्यु है और प्रेमकी परिणति मोक्ष है । मोह बिका है तो प्रेम टिका है । मोह मस्ताना है पर प्रेम दीवाना है । मोह आदान है, प्रेम प्रदान है । प्रेम उपासना है तो मोह वासना है । रागसे मोहकी उत्पत्ति होती है और अनुरागसे प्रेम पोषित होता है ।

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