मोह की रस्सी

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जनक बड़े ब्रह्मवेत्ता थे. उनके पास ज्ञानियों का जमावड़ा रहता था. एक ऋषि ने अपने पुत्र को ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के लिए जनक के पास भेजा.
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ऋषिपुत्र जनक के पास आया. जनक पारखी थे, उस बालक के हाव-भाव से उसे पूरा समझ गए.
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जनक ने महल में ही उसके रहने का प्रबंध कराया जो उसने स्वीकार लिया.
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अगले दिन जनक ने उसे उपदेशालय में बुलाकर आने का कारण पूछा.
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ऋषिपुत्र ने कहा- मैंने सारे शास्त्र पढ़ लिए. यह संसार मिथ्या है. दुख औऱ मृत्यु तो सबसे समक्ष होना ही है. कुछ भी स्थिर नहीं है. फिर ब्रह्म क्या है ? मुझे ब्रह्मज्ञान की अभिलाषा है.
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जनक उसे उपदेश देने लगे. तभी एक सेवक ने आकर कहा- महाराज महल में आग लग गई है.
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जनक ने लापरवाही से मात्र सेवक की बात सुनी और टाल दी. वह उपदेश देने में लगे रहे.
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थोड़ी देर में सेवक फिर लौटा. आग बढ़ती-बढ़ती कहां तक पहुंच चुकी है इसका पूरा ब्योरा दिया. जनक ने कहा- चिंता की बात है. परंतु तुम अभी जाओ.
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जनक फिर ऋषि कुमार को उपदेश देने लगे. सेवक द्वारा आग का बार-बार ब्योरा सुनकर ऋषि कुमार का ध्यान ब्रह्म उपदेश से हटकर आग की गति पर जा टिका.
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उसके सामने जनक ब्रह्म व्याख्या कर रहे थे किंतु वह तो अंदाजा लगा रहा था कि आग कहां तक पहुंची होगी.
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थोड़ी देर में सेवक फिर लौटा और घबराते हुए बोला- अब तो आग अतिथि गृह तक पहुंच गई है.
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इस पहले कि जनक कुछ उत्तर देते ऋषि कुमार खड़ा हुआ और बोला- महाराज मेरी तो लंगोट और धोती टंगी है. उतार लाता हूं, कहीं जल न जाए.
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जनक बोले- ऋषि कुमार तुम कहते हो कि संसार के सारे शास्त्र पढ़कर समस्त ज्ञान प्राप्त कर लिया है.
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क्या यही ज्ञान है ? इसी के आधार पर संसार को मिथ्या कह रहे हो. तुम्हारा मोह तो खूंटी पर लटके साधारण वस्त्रों से लिपटा है.
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मोह ही अज्ञान की वह रस्सी है जिसमें सारा ज्ञान उलझकर छटपटाता रह जाता है. कुछ प्राप्त करने के स्थान पर कुछ प्रदान करने की भावना से बिताया एक दिन प्राप्ति की इच्छा वाले सौ दिनों से ज्यादा सुखमय होता है. यही ब्रह्म सत्य है.

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