मीरा चरित भाग- 89

उमड़ घुमड़ कर कारी बदरियाँ, बरस रही चहुँ ओर।
अमुवाँ की डारी बोले कोयलिया, करे पपीहरा शोर॥
चम्पा जूही बेला चमेली, गमक रही चहुँ ओर।
निर्मल नीर बहत यमुना को, शीतल पवन झकोर॥
वृंदावन में खेल करत हैं,राधे नंद किशोर।
मीरा कहे प्रभु गिरधर नागर,गोपियन को चितचोर॥

चार-चार, छ:-छ: दिन तक मीरा का आवेश नहीं उतरता। दासियों के सतत् प्रयत्न से ही थोड़ा पेय अथवा नाम-मात्र का भोजन प्रसाद उनके गले उतर पाता।

मानधनी राजपूतों की अप्रसन्नता…..

इन्हीं दिनों समाचार मिला कि बहादुर शाह गुजराती चित्तौड़ पर चढ़ाई करने के लिए चला आ रहा है।जिन पहलवानों पर महाराणा विक्रमादित्य को नाज था, वे भयभीत होकर इधर उधर छिपने लगे।गुजराती फौज ने चित्तौड़ गढ़ को घेरकर भैरवपोल पर 1586 वि.स. की माघ पूर्णिमा के दिन अपना क़ब्ज़ा कर लिया।आश्चर्य यही है कि ये किले के ऊपर नहीं पहुँचे।ऊपर सेना तो थी नहीं, केवल पहलवान और सेवक थे।वे अपने प्रणों के भय से बंदूकें चला रहे थे।कहते हैं टूटी कमान दोनों ओर डराती है।राजमाता हाड़ीजी ने हुमायूँ से सहायता के लिए राखी भेजी।हुमायूँ सहायता के लिए सेना लेकर चला भी, किंतु ग्वालियर तक पहुँचते पहुँचते उसे बहादुर शाह का पत्र मिला कि मैं जिहाद पर हूँ।तुम विक्रमादित्य की मदद करोगे तो खुदा को क्या जबाब दोगे।इस पत्र को पढ़कर हुमायूँ वहीं ग्वालियर में ही रूक गया और उसने हाड़ी रानी की मदद नहीं करी।अब राजमाता हाड़ीरानी के पास संधि के अतिरिक्त कोई उपाय न रहा।बचे कुचे उमरावों से विचार विमर्श करके उन्होंने संधि का संदेश भेजा।महाराणा साँगा के समय माँडू राज्य का जो इलाका जीत लिया गया था, वह इलाका, जड़ाऊ कमरपट्टा और ताज देकर संधि की गई।इस संधि में सौ घोड़े, दस हाथी और बहुत से सिक्के भी दिये गये।बहादुर शाह वि. स. 1586 चैत कृष्ण 13 को चित्तौड़ से लौटा।

इस समय महराजा विक्रमादित्य के चाल चलन में सुधार आने की कुछ आशा लोगों के मन में हुई, किंतु इनका स्वभाव जैसा था वैसा ही रहा।ये न किसी का विश्वास करते न सम्मान।दिनरात चाटुकारों से घिरे रहते।मन ही मन कुढ़ हुये मानधनी राजपूतों के चिंतन की धारा ऐसा थी कि या तो आत्मगौरव का मान बनाये रखें या मान तज कर महाराणा के साथ रहें।विवश होकर उन्होंने चित्तौड़ छोड़ छोड़ अपने अपने गाँवों की राह ली।इतने पर भी महाराणा को तनिक भी विचार न हुआ।सच है-

‘नीम न मीठा होय, सींच गुड़ घी सूँ।
ज्याँ का पड्या सुभाव क जासी जीव सूँ।’

मीरा के महल में नाहर…..

‘बाई सा हुकुम, बाईसा हुकुम’- गोमती दौड़ी आई।उसकी आँखों में भय और छाती में साँस समा नहीं पा रही थी।व्याकुल दृष्टि से स्वामिनी की ओर देखकर उसने ड्योढ़ी की ओर हाथ से संकेत किया।मीरा आरती करके प्रणाम कर रही थी।सिर उठा कर उन्होंने सहज ही गोमती की ओर देखा और मुस्करा कर पूछा- ‘क्या हुआ? तू ऐसी घबरा क्यों रही है?’
‘बाईसा हुकुम, नाहर……’ उसके बोल उसके मुँह में रह गये।कक्ष के द्वार पर युवा केसरी नाहर खड़ा था।उसे देखकर गोमती दो पग मीरा की ओर बढ़ गई।उसी समय चम्पा दौड़ कर द्वार बंद करने लगी।
‘ठहर चम्पा, किवाड़ उघाड़ दे’- दृढ़ स्वर में मीरा ने कहा।
‘बाईसा हुकुम, द्वार पर प्रत्यक्ष काल खड़ा है’ चम्पा रो पड़ी- ‘अभी चार दिनपहले तो रोही(जंगल) से पकड़ा गया है।’
‘इसी काल के समीप से होकर तो तू भीतर आई है।द्वार खोल।आज तो नृसिंह पधारे हैं।जा तो पूजा सामग्री ला।’
पूजा की थाली हाथ में लेकर मीरा ने पुकारा- ‘पधारो प्रभु, आज तो दासी पर असीम कृपा की।बड़ी कृपा की प्रभु।’- कहते कहते गला भर आया उनका।जैसे वनराज उन्हीं की इजाज़त की प्रतीक्षा कर रहे हों, देहरी लाँघकर वे निश्चिंत भाव से कक्ष में पधारे।ऊपर उठी पूँछ उन पर चँवर कर रही थी।जीभ से होठ चाटकर एक लम्बी उबासी ली और शांत खड़े हो गये।स्वामिनी को निर्भय देख दासियों ने भी थोड़ा धीरज थामा।वे आरती भोग माला ताम्बूल धूप दीप फूल आदि शीघ्रतापूर्वक स्वामिनी के पासरखने लगीं।मीरा ने तिलक करने को हाथ उठाया तो नाहर ने मस्तक झुका दिया।माला पहना करके उन्होंने आरती की और दूध मलाई का भोग लगाया।केशरी ने मिठाई खाकर जीभ से लपर लपर दूध पिया।मीरा के साथ सभी दासियों ने धरती पर मस्तक टिका कर प्रणाम किया औरमन ही मन कहा कि हमारी स्वामिनी का बाल भी बाँका न होने देना प्रभु।
सिर झुकाकर नाहर ने मीरा का सिर सूँघा और पलट कर चल पड़ा।देहरी के पास खड़े होकर उसने सिर घुमाकर मीरा की देखा।मीरा ने हाथ जोड़कर सिर झुकाया।

उसी समय पहरेदार भैरू सिंह दोड़ा आया- ‘मेरी भूल क्षमा हो सरकार, मुझे अन्नदाता हुकुम ने याद फरमाया था।अभी लौट आऊँगा यह सोच बिना किसी अन्य को पहरा सौपें चला गया।लौटकर देखा…..।’ तभी ड्योढ़ी पर नाहर के दहाड़ने की आवाज आई।भैरू अपनी बात अधूरी छोड़ उधर भागा।वहाँ जाकर उसने देखा कि ड्योढ़ी के बाहर इधर उधर पिंजरा लाने वाले को नाहर ने दबोच कर मार डालाहै।फिर एक बार और जोर से दहाड़ मार उसने छलाँग भरी और वन की ओर दौड़ चला।भैरू भी दौड़कर भीतर आया और स्वामिनी के चरणों में जा गिरा- ‘आज मेरी चूक के कारण यह विपत्ति आई।’
मीरा ने नीचे बैठकर उसके सिर पर हाथ रखा- ‘भैरू क्या पुरस्कार दूँ तुझे भाई।आज तेरे कारण नरसिंह भगवान के दर्शन मिले।दु:ख मत कर मेरे वीर, उठ प्रसाद ले।चम्पा प्रभु के पधारने का उत्सव मनाओ।’
भैरू पहरे पर पहुँचा तब तक वहाँ से पिँजरा लोप हो चुका था।
‘बाई सा हुकुम’- चम्पा और चमेली ने मीरा के चरण पकड़ लिये- ‘आज आपको मेरी अर्ज सुननी ही पड़ेगी।हम अपना दु:ख आपको छोड़ कर और किसे सुनायें?’
‘ऐसा क्या हुआ, लालजी सा ने कुछ और तमाशा किया क्या?’
‘तमाशा, तमाशे तो अन्नदाता हुकुम नित्य ही किया करते हैं।छोटे मुँह बड़ी बात कहना शोभा नहीं देता हुकुम।मेड़ते की याद आने लगी है हुजूर।बहुत समय हो गया।यदि आप पधारें तो हमें भी…..।’ चमेलीने बात अधूरी छोड़ दी।
‘तुम्हारी बात समझ में आरही है मेरी।तुम सबका मन है चलने का तो दाता हुकुम (वीरमदेव जी) को लिख दूँगीं।अपने यहाँ चित्तौड़ में ही क्या गढ़ा है? सारी धरती प्रभु की ही तो है।जहाँ वे चाहें वहीं बसजाये हमतो।’
क्रमशः

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