मीरा चरित भाग -6

वहाँ जाकर झरोखेमें लकड़ीकी चौकी सीधी करके और उस पर अपनी नयी ओढ़नी बिछा करके ठाकुरजी को विराजमान कर दिया। थोड़ी दूर बैठकर वह उन्हें निहारने लगी। रह-रह करके आँखोंसे आँसू निकल पड़ते। आजकी इस उपलब्धिके सम्मुख मीराके लिये सारा जगत् तुच्छ हो गया। जो अब तक अपने थे, वे सब सामान्य या पराये हो गये और आज आया हुआ यह नन्हा-सा मुस्कुराता पाहुना ऐसा अपना हुआ, जैसा अबतक कोई न था। सारी हँसी-खुशी, खेल-तमाशे, नाच-गाना, पहनना ओढ़ना सब कुछ इसपर न्यौछावर हो गया। हृदयमें जैसे हर्षकी सीर खुल गयी और उत्साह जैसे उफना पड़ रहा था—”क्या करूँ इसके लिये, जिससे यह प्रसन्न हो, इसे सुख मिले।”

“अहा, कैसे देख रहा है मेरी ओर? अरे भूल हुई; तुम भगवान् हो! तू, तू कर गयी मैं। अहा! कितने अच्छे हैं आप, कितनी कृपा की कि उन संतके पाससे मेरे पास चले आये। मुझे तो कुछ आता ही नहीं; कुछ भूल हो जाय तो रूठना नहीं हो। बता देना कि ऐसा नहीं, वैसा। फिर भूल नहीं होगी, कभी न होगी। उन महात्माकी याद तो नहीं आ रही? आती तो होगी ही। न जाने कबसे उनके साथ रह रहे थे। वे तो तुम्हें मुझे देते हुए रो ही पड़े थे। मैं तुम्हें बहुत अच्छी तरह रखूँगी। अपने साथ ही सुलाऊँगी, नहलाऊँगी । बहुत फूल हैं फुलवारीमें। लाकर तुम्हें सजाऊँगी और आज ही बाबोसासे कहकर तुम्हारे लिये पलंग, हिंडोला, गद्दी, मोड़े, सिरक, दोवड़, पछेवड़ी और किमखाबके बागे भी बनवा दूँगी। ऐसा सजाकर रखूँगी कि बस, लोग देखते रह जायँ। तुमने मंदिरमें चारभुजानाथको देखा है? नहीं! मैं ले चलूँगी तुम्हें दर्शन कराने। वे सदा ही ऐसे सजे-धजे रहते हैं, जैसे अभी-अभी बींद बने हों। मैं तुम्हें उनसे भी ज्यादा सजाकर रखूँगी।”

“तुम चलोगे मेरे साथ रनिवास की फुलवारी में? वह छोटी-सी है। भला परकोटे के अंदर बड़ा बाग कैसे लग सकता है, है न? वैसे कभी-कभी तीज त्यौहारपर हम बड़े बागमें भी चलेंगे। वहाँ झूला झूलेंगे हम। डावड़ियाँ (दासियाँ) और काकी-भौजाइयाँ, दमामणियाँ (गाने बजानेवाली जाति) गीत गाती हैं। अहा, बहुत मजा आता है तब, जब झूला रुकने पर देवरानी-जेठानी स्त्रीको, भाई-बंधु पुरुष को झूले से उतरने नहीं देते, एक दूसरे का नाम बताये बिना। बहुत बार तो चलते झूलेपर ही सोटे मारने लगते हैं कि नाम बताओ। जानते हो? सीधे-सीधे कोई नहीं बताता, थोड़ी मार खाकर, थोड़ा मनुहार करवाकर फिर दोहे या छंदमें नाम बोला जाता है, समझे?”

“बड़ों को कोई परेशानी नहीं होती; वे बड़े जो होते हैं। आरामसे थोड़े नखरेके बाद नाम बोल देते हैं, पर छोटों को? राम-राम कहो! मेरे कुँवरसा (पिताजी) की तो बड़ी बुरी हालत हो जाती है। बड़े भाइयों के, काकाओं के सामने कैसे भाबू (माँ) का नाम लें? जानते हो, जब दिन में लड़कियाँ झूलती हैं तो वे भी बड़ों की देखा-देखी सोटे मारकर झूलनेवालियों को नाम लेनेको कहती हैं। लक्ष्मी जीजा और जसवंत जीजा कहती हैं कि अरे हमें क्यों मारती हो, हम किसका नाम लें? लेकिन सुने कौन? जब तड़ातड़ मार पड़ी तो कहने लगीं कि-‘ठहरो, हम ले रही हैं नाम!’ जानते हो क्या कहा उन्होंने? ही, ही, ही, वे बोली-‘हूँ, हूँ। ‘तुम सोचते होगे कि हँसे जा रही है कुछ कहती तो है नहीं! तुम, आप सुनोगे तो आप भी हँसोगे। जसवंत जीजा बोली- ‘झाड़क्या में झाड़क्यो, झाड़क्या में जवरो, चिरकला (नर चिड़िया) जी गाँव ग्या, जसुजी अकेला इ रो।’ उनकी देखा-देखी लक्ष्मी जीजाने और फिर सब लड़कियों ने यही नाम लिया, और तो और मैंने भी।”

मीराको फिर हँसी छूटी। कुछ देर हँसनेके बाद एकदम गम्भीर होकर बोली- “अब मैं किसी चिड़िया-फिड़िया का नाम नहीं लूँगी। यदि तुम इजाजत दो तो तुम्हारा नाम ले लूँ? किन्तु, किन्तु मुझे तो तुम्हारा नाम ही नहीं मालूम ! क्या नाम है तुम्हारा? मुझे नहीं बताओगे? अच्छा कान में बता दो, मैं किसीसे नहीं कहूँगी। अच्छा न कहो, मैं बाबोसासे पूछ लूँगी। अभी….।”

“बाईसा हुकम! पधारिये भोजन कर लीजिये।”–दासी ने आकर कहा। “क्या? जा तू यहाँसे। मुझे नहीं करना भोजन-वोजन ।”

दासीने देखा— “यह क्या हो रहा है बाईसाको? आँखों में आँसू, होठों में हँसी, देह में कम्प और ललाटपर पसीना। अकेले-अकेले बतराना, कोई रोग तो नहीं है? अथवा…. अथवा…. कहीं… किसी भूत-प्रेतकी छाया….!”- उसने नीचे जाकर मीराकी दशा कह सुनायी।

“मीरा! क्या हुआ बेटी तुझे?”- माँने आकर उसके कंधेपर हाथ रखा- “अरे ये ठाकुरजी कहाँसे लायी तू?”

“क्या है माँ! मुझे भूख नहीं है अभी। जब लगेगी तो आकर खा लूँगी।”

“तुझे भूख नहीं है, तो क्या इन्हें भी भूखा रखेगी? चल उठ। हाथ-पैर धोकर इन्हें भोग लगा और फिर तू भी प्रसाद पा।”
“अरे हाँ, यह बात तो मैं भूल ही गयी।” -मीरा ने माँ का हाथ पकड़ा और चलने को उद्धत होते हुए ठाकुर जी की ओर देखते हुए संकेत किया -“अभी आई मै, हो! घबराना नही।”

‘बाबोसा! आप भीतर पधारकर मेरे ठाकुरजीके दर्शन करिये न।’ मीराने दूदाजीका हाथ पकड़कर आग्रह किया।

‘तेरे ठाकुरजी कहाँसे आ गये भला?’– उन्होंने मीराके माथेपर हाथ रखकर बड़े लाड़से पूछा। ‘परसो जो संत आये थे न, उन्होंने ही दिये आज सबेरे मुझे। मैंने उनका फूलोंसे शृंगार किया है। आप देखिये न चलकर।’

‘क्या सचमुच संत ने दिये हैं?’

‘हाँ, हुकम! उन्होंने ही तो दिये हैं। नहीं तो मैं कहाँ से लाती? मैंने कल उनसे माँगा था ठाकुरजी को। उन्होंने मना कर दिया। आज सबेरे उन्होंने कहा कि ठाकुरजी ने सपने में मुझे कहा है कि मैं मीराके पास रहूँगा, अतः मुझे उसे दे दो और उन्होंने मुझे दे दिया। बाबोसा और सब बात तो उन्होंने बतायी, पर ठाकुरजी का नाम तो बताया ही नहीं। सच तो यह है कि मैं ही पूछना भूल गयी। अब आप जल्दी से चलकर उनके दर्शन कीजिये और नाम भी बताइये उनका।’

‘मैं आ रहा हूँ बेटा! तुम भीतर जाकर खबर करो।’–दूदाजीने कहा। मीरा दौड़कर अंत:पुरमें गयी और चौक से ही चिल्लाकर बोली- ‘आप सब एक ओर हो जायँ। बाबोसा पधार रहे हैं मेरे ठाकुरजीके दर्शन करने।’

मीराकी बात सुनकर बहुएँ सब अपने-अपने कक्षमें चली गयीं। मीराकी माँ अपनी जेठानीके कक्षमें जाती हुई बोलीं- ‘भाभीसा! यह छोरी तो ठाकुरजीके पीछे पागल ही हो रही है। साथ-साथ अन्नदाता हुकम को भी इधर-उधर दौड़ाये दे रही है, अन्यथा अभी दोपहरमें विश्रामके समय उठाकर यहाँ लानेकी क्या तुक है?
क्रमशः

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