अध्यात्मवाद (Adhyatmvad)

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साकार से निराकार

प्रमात्मा तो!कल्पना ओर समय से,भी, परे का विषय है!! क्योकि!इस पूरी स्वप्न रूपी सुष्टि का,मालिक,स्वयंम प्रकाशित,अनन्त, अखंड ओर अजन्मा है!!

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भगवान तुम ही हो

एक भक्त की जन्म से ही मन में ये इच्छा बन जाती है भगवान की पूजा आरती करनी है भगवान

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सच्चा ज्ञान

.                                         नामदेव महाराष्ट्र के महान् सन्त थे। परन्तु इनके मन में सूक्ष्म अभिमान घर कर गया था कि भगवान्

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भोला के 40 रूपये

भोला अपनी बहन के साथ गांव में मिट्टी के मटके बनाने का काम करता था ।भोला 12 साल का था

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मौन

भक्त भगवान को भजते हुए नाम जप कीर्तन करते हुए देखता है कि भाव की गहराई नहीं बन रही है

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दिव्य_वृंदावन

संतो की कृपा जिस पर हो जाए उसे फिर क्या नहीं मिल सकता,.अकबर जैसे बादशाह पर कृपा हुई तो उसे

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“पण्डितराज”

प्रेम किया है पण्डित , संग कैसे छोड़ दूँगी ? जितनी बार भी पढ़ो ,, वही आनंद मिलता है। “पण्डितराज”.सत्रहवीं

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   “गुप्त भजनानन्दी”

.                                   भगवान् का भजन गुप्त रखना चाहिये। इससे भजन करनेवाले को बड़ा लाभ होता है, इस पर एक दृष्टान्त

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