
चलो मन वृंदावन की परिक्रमा करी आवे।
1 चलो चले मन वृंदावन की परिक्रमा करी आवे।द्वादश वन हैं इनके अंदर कृपा सबहि की पावे।।2 शुरू करें गुरु
1 चलो चले मन वृंदावन की परिक्रमा करी आवे।द्वादश वन हैं इनके अंदर कृपा सबहि की पावे।।2 शुरू करें गुरु
श्रीकृष्ण के लीला काल का समय था, गोकुल में एक मोर रहता था, वह मोर श्रीकृष्ण का भक्त था, वह
जय जय सुरनायक जन सुखदायक प्रनतपाल भगवंता।गो द्विज हितकारी जय असुरारी सिंधुसुता प्रिय कंता।। पालन सुर धरनी अद्भुत करनी मरम
जय शिवशंकर, जय गंगाधर, करुणा कर करतार हरेजय शिवशंकर, जय गंगाधर, करुणाकर करतार हरे,जय कैलाशी, जय अविनाशी, सुखराशि, सुख सार
जय राम रमारमणं समनं । भव ताप भयाकुल पाहि जनं ॥अवधेस सुरेस रमेस विभो । सरनागत मागत पाहि प्रभो ॥
नमो नमो जी शंकरा, भोलेनाथ, शंकराजय हो, जय हो शंकरा, भोलेनाथ, शंकरा आदिदेव, शंकरा, हे शिवाय, शंकरा तेरे जाप के
ॐ स्थिराय नमः।ॐ स्थाणवे नमः।ॐ प्रभवे नमः।ॐ भीमाय नमः।ॐ प्रवराय नमः।ॐ वरदाय नमः।ॐ वराय नमः।ॐ सर्वात्मने नमः।ॐ सर्वविख्याताय नमः।ॐ सर्वस्मै
ऐ मेरे स्वामी अंतरयामी नित जपते तेरा नामतेरे भरोसे छोड़ दी नैया तू जाने तेरा कामऐ मेरे स्वामी अंतरयामी जीवन
अरे मैं वृंदावन को जाऊं मेरे श्याम खेल रहे होली,मेरे श्याम खेल रहे होली, घनश्याम खेल रहे होली,अरे मैं वृंदावन
केसर रंग से भरी पिचकारी लाई, पिचकारी लाईमैं तो सांवरे के संग होरी खेलन आई…..राधा रानी संग विशाखा, सखियां सारी