
मन लागो यार फ़कीरी में
मन लागो यार फ़कीरी में, माला कहे है काठ की तू क्यों फेरे मोहे, मन का मनका फेर दे सो

मन लागो यार फ़कीरी में, माला कहे है काठ की तू क्यों फेरे मोहे, मन का मनका फेर दे सो

जय वृहस्पति देवा, ऊँ जय वृहस्पति देवा । छिन छिन भोग लगाऊँ, कदली फल मेवा ॥ ऊँ जय वृहस्पति देवा,

बन्दे चल सोच समझ के क्यों ये जनम गवाय, बार बार ये नर्तन चोला तुझे न मिलने पाय ॥ बचपन

फसी भवर में थी मेरी नैया। रचा है सृष्टि को जिस प्रभु ने, रचा है सृष्टि को जिस प्रभु ने,

तू कर बंदगी और भजन धीरे धीरे । मिलेगी प्रभु की शरण धीरे धीरे । दमन इन्द्रियों का तू करता

तूने कमाया है जो याहा तेरे मोक्ष में वो रंग लाएगा बाँध के गठरी कर्मो की साथ याहा से जाएगा

नर कपट खटाई त्याग करा कर काम भलाई के, तेरा होजा गा कल्याण भजन कर ले रघुराई के, भले करम

सवेरे वाली गाडी से चले जायेगे, कुछ लेके जायेगे कुछ देके जायेगे ये मेला दो घडी का दो दिनों की

आ जाओ अग्रोहा धाम ये खुशियों का नगर है भगवन का घर है यहाँ किस बात का डर है बैठा

कोण किसै नै घराँ बुलावै, कोण किसे कै जावै रै हर दाणे पै मोहर लागरी, कोण दाणा पाणी ल्यावै कोण