
निधियों की निधि प्रियाजु
श्री कृष्णप्राणेश्वरी श्री किशोरी जु माधुर्य सार सर्वस्व की अधिष्ठात्री है । अर्थात माधुर्य जो भी है वह उनकी कृपा

श्री कृष्णप्राणेश्वरी श्री किशोरी जु माधुर्य सार सर्वस्व की अधिष्ठात्री है । अर्थात माधुर्य जो भी है वह उनकी कृपा

कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! भगवान श्रीकृष्ण पूर्णावतार हैं…. उनकी श्रेष्ठता, कृतज्ञता शब्दों में व्यक्त करना हम जैसे सामान्य व्यक्तियों के लिए

चिदानंद रूपः शिवोहम शिवोहम…मैं मन, बुद्धि, अहंकार और स्मृति नहीं हूँ, न मैं कान, जिह्वा, नाक और आँख हूँ। न

संन्यासी का अर्थ है : जो निरंतर जागा हुआ जी रहा है, होशपूर्वक जी रहा है। कदम भी उठाता है,

ईश्वर आलोक, आनंद और अमृत के परम अनुभव का नाम है। ईश्वर को कहीं बाहर खोजा या पाया नहीं जा

एक संत थे, वे भगवत भाव में रहते हुए व भक्ति प्रसाद बांटते हुए गाँव गाँव शहर शहर भ्रमण करते

एक बार एक राज महल में कामवाली का लड़का खेल रहा था. खेलते खेलते उसके हाथ में एक हीरा आ

“वृंदावन” में एक भक्त रहते थे जो स्वभाव से बहुत ही भोले थे। उनमे छल, कपट, चालाकी बिलकुल नहीं थी।

हमारे जीवन की सभी समस्याओं की वजह सिर्फ दो शब्द है.? हम सपने बहुत जल्दी देखते हैं,और कार्य बहुत देरी

एक बार श्रीकृष्ण और राधा जी निधिवन में रात्रि में सभी गोपियों के साथ हास परिहास कर रहे थे। राधा