
शूलीसे स्वर्णसिंहासन
राजपुरोहित तथा सेठ सुदर्शनकी प्रगाढ़ मैत्री थी। पुरोहितजीकी पत्नीने सेठके सदाचारकी परीक्षा लेनेका निश्चय किया। एक दिन जब पुरोहितजी घरसे

राजपुरोहित तथा सेठ सुदर्शनकी प्रगाढ़ मैत्री थी। पुरोहितजीकी पत्नीने सेठके सदाचारकी परीक्षा लेनेका निश्चय किया। एक दिन जब पुरोहितजी घरसे

प्राचीन समयकी बात है। यूनान अपनी कला और दर्शनके लिये दूर-दूरके देशोंमें प्रसिद्ध था। यूनानके कारिन्थ प्रदेशमें पेरिवंडर नामका एक

खुशी बाँटो, खुश रहो एक कंजूस सेठ था। उसकी कंजूसीके कारण पड़ोसी, मित्र, रिश्तेदार यहाँतक कि उसकी पत्नी और बेटे

हमारे हितकी भाषाका प्रयोग एक धनी व्यक्तिके घरमें आग लग गयी। बाहर निकलनेका केवल एक दरवाजा था। वहाँ एक कमरे

विराट् विश्वको अभय, अद्वेष और अखेदका दिव्य संदेश देनेवाले भगवान् महावीरने साधना-पथपर चलनेवाले साधकोंको सम्बोधित करके कहा- ‘साधको! तुम स्वयं

‘कर्मफल तो भोगना ही पड़ता है’ मार्गमें एक घायल सर्प तड़फड़ा रहा था। सहस्रों चींटियाँ उससे चिपटी थीं। पाससे एक

चरित्र-बल नोबेल पुरस्कार विजेता सी0वी0 रमण भौतिकशास्त्र के प्रख्यात वैज्ञानिक थे। अपने विभागके लिये उन्हें एक योग्य वैज्ञानिककी जरूरत थी।

पदप्राप्तिसे हानि चीनी दार्शनिक चुआँग-जू नदीके किनारे बैठा मछलियाँ पकड़ रहा था, तभी एक राजदूतने आकर उससे कहा, ‘सम्राट्ने आपको

प्राचीन कालमें एक परम शिवभक्त राजा था। एक दिन उसे कल्पना सूझी कि आगामी सोमवारको अपने इष्टदेव शंकरका हौद दूधसे

सबसे अच्छेकी तलाश एक युवकने एक सन्तसे कहा-‘महाराज! मैं जीवनमें सर्वोच्च शिखर पाना चाहता हूँ, लेकिन इसके लिये मैं निम्न