
प्रभु प्रेम के भाव
जहाँ प्रेम है वहां प्रभु प्रेम की खोज प्रारम्भ होती है। वह किरया कर्म में परमात्मा को खोजता है। हे

जहाँ प्रेम है वहां प्रभु प्रेम की खोज प्रारम्भ होती है। वह किरया कर्म में परमात्मा को खोजता है। हे

भगवान को याद करते हुए यह भाव दिल में बनते हैं। कि आज मेरे स्वामी भगवान् नाथ देखो मुस्करा रहे

भगवान ने गोपी प्रेम के माध्यम से मानव जाति को प्रेम का सन्देश कितने मनोभाव से प्रकट किया है और

कान्हा को राधा ने प्यार का पैगाम लिखा पूरे खत में सिर्फ कान्हा-कान्हा नाम लिखा. कोई प्यार करे तो राधा-कृष्ण

आज मैं अपने मन को दिल को नैनो राम नाम अमृत रस का रसपान कराना चाहती हूं। आत्मा कहती हैं

जय श्री राम परमात्मा हममें समाया हुआ है। यह कहने मात्र से बात नहीं बनती है। जब तक भगवान को

जब तक “मै” है तब तक इच्छाएं हैं। ये शरीर मेरा मै भगवान का भक्त हू। भगवान् मेरे है। इन

हिन्दुओं में 12 महिने व्रत और त्योहार है। हिन्दू धर्म की संस्कृति ही निराली है। हर त्यौहार पर जब हम

ये सुरज और चांद नहीं ये प्रभु का आभामंडल है। भगवान कृष्ण जल में झांकते है मस्तक पर चमकता प्रकाश

परमात्मा श्रीराम परम आनंद का स्वरुप हैं । जो श्रीराम से प्यार करता है ,उसका जीवन भी परम आनंद