
श्रीचैतन्य महाप्रभु जी का स्पर्श पाते ही पद्मा नदी में ऊँची-ऊँची लहरें उठने लगीं।
बात उन दिनों की है जब यशोदा-नन्दन भगवान श्रीकृष्ण, श्रीचैतन्य महाप्रभुजी के रूप में पृथ्वी पर आये हुये थे। उनके

बात उन दिनों की है जब यशोदा-नन्दन भगवान श्रीकृष्ण, श्रीचैतन्य महाप्रभुजी के रूप में पृथ्वी पर आये हुये थे। उनके

मीरा हँस पड़ी- ‘ऐसा न करना हो। भगवान् धरती पर पधारते हैं तो उन्हें देखकर, छूकर, सुनकर, कैसे भी उनसे

यह स्तोत्र स्वयं सिद्ध अनुभूत तथा अचूक है। अति गोपनीय स्तोत्र का जीवन में प्रयोग करें और अत्यंत चमत्कारिक लाभ

नगर से सैकड़ों कोस दूर सुदूर वन में तपस्या कर रहे उस वृद्ध ऋषि ने दूर उस निश्चित स्थान की

स्वामी विवेकानंद एक बार एक रेलवे स्टेशन पर बैठे थे उनका अयाचक (ऐसा व्रत जिसमें किसी से मांग कर भोजन

एक समय की बात है एक भाई बहन रहते थे। बहन का नियम था कि वह अपने भाई का चेहरा

रह-रहकर उसके नेत्र अर्धनिमीलित हो जाते हैं। पुकारने पर वह उनकी ओर देखती तो है, किन्तु जैसे उस दृष्टिमें जीवन

‘कहीं दर्द होता है मीरा?’– दूदाजीने कहा—’वैद्यजीको बताओ।’ मीराकी समझमें नहीं आया कि क्या कहे। वह उठकर खड़ी हो गयी।

नमो केसरी पूत महावीर वीरं, मंङ्गलागार रणरङ्गधीरं।कपिवेष महेष वीरेश धीरं, नमो राम दूतं स्वयं रघुवीरं।नमो अञ्जनानंदनं धीर वेषं, नमो सुखदाता

‘अरे, यह क्या बावलापन है?’ माँने फिर समझानेका प्रयत्न किया ‘जा बाबोसासे पूछ, वे बतायेंगे। मैं कोई पुरुष हूँ कि