
मीरा चरित भाग- 11
ठहरिये दादोसा! लगे हाथ एक वरदान चारभुजानाथसे और माँग लूँ। ऐसे पावन पर्व जीवनमें बार-बार नहीं आते।’- पिताके वक्षसे अलग

ठहरिये दादोसा! लगे हाथ एक वरदान चारभुजानाथसे और माँग लूँ। ऐसे पावन पर्व जीवनमें बार-बार नहीं आते।’- पिताके वक्षसे अलग

‘अब मैं जाऊँ कुँवरसा? गिरधर गोपाल अकेले हैं..??”‘जाओ बेटी! तुम्हारी माँ तुम्हें पहुँचा आयँगी।’‘नहीं कुँवरसा! मैं चली जाऊँगी। डर-वर नहीं

‘वाह, तुमने तो चारणोंके समान प्रसन्न कर दिया मुझे। सच, जिस समय कड़खों और रणभेरीकी आवाजें कानोंमें पड़ती हैं। कवचकी

यदि वे मुझे जलती हुई अग्निमें कूद पड़नेको कहें तो क्या मैं यह आगा-पीछा सोचूँगा कि मेरे पीछे मेरी पत्नी

ठाकुरजीको ही बाहर ले जाकर दिखा देती न? सारे रनिवासमें दौड़म-दौड़ मच गयी।’ ‘बीनणी! काला री गत कालो इ जाणे।

वहाँ जाकर झरोखेमें लकड़ीकी चौकी सीधी करके और उस पर अपनी नयी ओढ़नी बिछा करके ठाकुरजी को विराजमान कर दिया।

कृष्णभक्त संत द्वारा प्रदत्त ठाकुर जी … एक बार ऐसे ही मीरा राज महल में ठहरे एक संत के समीप

कठिनाई उस समय हुई जब बड़ी बहन गुलाब कुँवर बाईसा ने कहा “मुंह खोलो भाई! बेटी के बाप बने हो।

राव जयमल की तीन रानियां थी। इनमें से दो राजकुमारी और सोलह राजकुमार हुए। पांचवे पुत्र मुकंद दास उनके उत्तराधिकारी

राव दूदा की संतति……. राव दूदा के पांच पुत्र हुए- वीरमदेव, रायमल, रायसल, रतनसिंह और पंचायण।(१) राव वीरमदेव:- राव दूदा