मीराबाई (Meerabai)

मीरा चरित भाग- 55

हिंडोले पर सुंदर सुकोमल बिछौना बिछाया।तब तक उनकी स्वामिनी अपने हृदयधन का हाथ थामें आ गईं। दोनों के विराजित होने

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मीरा चरित भाग-52

‘आप कभी याद करने की कृपा नहीं करतीं हैं भाभीसा।बहुत इच्छा रहती है आपके दर्शनों की, किंतु जिससे पूछो वही

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मीरा चरित भाग- 53

अब तो कभी कभार ही वहाँ महलों में पधारते हैं।बाई हुकुम कुछ खाने को दें भी तो फरमाते हैं कि

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मीरा चरित भाग- 50

बिना श्रद्धा और विश्वास के कुछ हाथ नहीं लगता, क्योंकि कार्य अपने कारण को नहीं जान सकता।बेटा कैसे जान सकता

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मीरा चरित भाग- 49

मैनें सुना है जब वह गाती है तब आँखों से आँसू बहने लगते हैं।जी चाहता है ऐसी प्रेम मूर्ति के

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मीरा चरित भाग- 51

मीरा के हाथ से वस्त्र, सुई गिर पड़ी, हाथ गोद में गिर पड़े और सिर से साड़ी सरक गई।पाटल पाँखुरी

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मीरा चरित भाग- 48

आज महाराणा साँगा का मुख प्रसन्नता से खिल उठता था।अस्सी घावों भरी देह, एक हाथ, एक पाँव और एक आँख

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मीरा चरित भाग- 47

आखिर विदाई का दिन भी आया। चारों ओर दहेज जमा करके बीच में पलंग पर मीरा और भोजराज को बिठाया

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मीरा चरित भाग- 46

भाणेज बावजी (जयमलजी) ने केवल कटार से आखेट में झुंड से अलग हुए एकल सुअर को पछाड़ दिया। हमारे महाराज

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मीरा चरित भाग- 45

इन चूड़ियों में से, जो कोहनी से ऊपर पहनी जाती हैं उन्हें खाँच कहते हैं) गलेमें तमण्यों (यह भी ससुराल

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